आपदा में लापता हुए लोगों के परिजनों पर असर डाल रहा सात साल का नियम
शिमला – नितिश पठानियां
मानसून का दौर हिमाचल में भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन नासूर बने जख्म अब भी कौंध रहे हैं। समेज हादसे के 71 दिन बाद भी लापता 33 लोग कागजों में जिंदा हैं और इनके परिजनों को इसी अवस्था में सात साल तक इंतजार करना होगा।
दरअसल, प्रदेश में किसी भी लापता व्यक्ति को मृतक घोषित करने के लिए सात साल की अवधि तय की गई है। सात साल तक लापता से जुड़े तमाम दस्तावेज और जमीन संबंधित कागज उत्तराधिकारी के नाम पर ट्रांसफर नहीं हो सकते हैं।
गौरतलब है कि 31 जुलाई की रात को बादल फटने की घटना से शिमला, कुल्लू और मंडी में 55 लोगों की मौत हुई थी। बादल फटने के बाद शिमला से 33, कुल्लू से 12 और मंडी से 10 लोग लापता हो गए थे। इनमें से अब 33 लोग ऐसे हैं, जिनकी तलाश पूरी नहीं हो पाई।
समेज से सबसे ज्यादा 13 लोग लापता हैं। यहां हादसे के दौरान 33 लोग तेज बहाव की चपेट में आ गए थे। इनमें से 20 के शव बरामद हो पाए। राज्य सरकार ने हादसे में लापता लोगों को ढूंढने के लिए तीनों जिलों में एनडीआरएफ की मदद से अभियान चलाया था।

मंडी में सर्च आपरेशन को रोकने के बाद राज्य सरकार ने शिमला और कुल्लू में 22 अगस्त को आपरेशन खत्म कर दिया।खोज अभियान में जुटी एनडीआरएफ की टीमें यहां से रवाना हो गई थीं। सर्च आपरेशन के दौरान जो शव और अंग बरामद हुए थे। उनकी पहचान डीएनए के सैंपलों से पाई है। शवों की पहचान के बाद इन्हें परिजनों के हवाले कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जिनके परिजन अब भी लापता की सूची में हैं।
इस हादसे के बाद मुख्यमंत्री समेत अन्य मंत्रियों ने भी समेज सहित अन्य प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था, जबकि मंडी की सांसद कंगना रणौत और पीडब्ल्यूडी मंत्री विक्रमादित्य सिंह भी हादसे में आहत परिवारों से मिलने पहुंचे थे। उस समय यह संभावना जताई जा रही थी कि राज्य सरकार लापता लोगों को लेकर तय एक्ट में बदलाव कर सकती है, लेकिन अभी तक इस बारे में कोई भी फैसला नहीं हो पाया है।
65 लोगों की हुई थी मौत
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव डीसी राणा ने बताया कि मानसून के दौरान पिछले कुछ महीनों में राज्य में बादल फटने की घटना में 65 लोगों की मौत हुई है। इनमें से 33 अभी भी लापता हैं। लापता लोगों को ढूंढने के लिए रेस्क्यू आपरेशन लांच किया गया था।

