हिमखबर डेस्क
हिमाचल में कल का दिन काफी अहम है। एक ओर जहां पूरे देश की निगाहें लोकसभा के नतीजों पर टिकी हैं, तो वहीं हिमाचल प्रदेश की निगाहें विधानसभा उपचुनावों पर हैं, क्योंकि ये उपचुनाव सरकार का भविष्य तय करने वाले हैं। कांग्रेस पर उत्तर भारत में बची अपनी एकमात्र सरकार को बचाने का दबाव है।
प्रदेश में 68 में से 6 सीटों पर अभी उपचुनाव हुए हैं। बाकी बची 62 सीटों में से कांग्रेस के पास अभी 34 सीटें है, भाजपा के पास 25 जबकि 3 निर्दलीय विधायक थे, जिनके इस्तीफे की अर्जी पर विधासनभा अध्यक्ष के पास सुनवाई रखी गई थी, मतगणना से एक दिन पहले स्पीकर ने इस्तीफे पर फैसला सुना दिया है।
तीनों का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। इसमें देहरा से होशियार सिंह, हमीरपुर से आशीष शर्मा और नालागढ़ से केएल ठाकुर की विधायकी चली गई है। हालांकि निर्दलीय विधायकों का कहना है कि फैसला भले ही देरी से आय़ा पर सही फैसला आय़ा है।
अब माना जा रहा है कि प्रदेश में अब जल्द ही 3 सीटों पर उपचुनाव हो सकता है, वहीं इस मामले पर के एल ठाकुर का कहना था कि अब अगर बीजेपी उन्हे टिकट देगी तो वो जरूर दोबारा चुनाव लड़ेंगे।
बता दें कि निर्दलीय ने सियासी उथल-पुथल के बीच 22 मार्च को अपना इस्तीफा दे दिया था, मगर ये स्वीकार नहीं हो पाया था, जिसके बाद ये मामला हाई कोर्ट तक भी पहुंच गया था। खैर अब कल आने वाले नतीजों की बात करें तो कांग्रेस के नेता लगातार मतदान के बाद पंचायत स्तर पर रिपोर्ट इकट्ठा कर रहे हैं और जमा घटाव में लगे हुए हैं कि किस विधानसभा क्षेत्र के किस पोलिंग बूथ पर कितनी वोटिंग हुई। यहां का सियासी समीकरण क्या है, किस पंचायत में कितने वोट पड़े हैं, किसके पक्ष में इसका नतीजा रहने वाला है
हिमाचल में बहुमत का जादुई आंकड़ा 35
इस वक्त अगर देखा जाए तो कांग्रेस के पास सिर्फ 34 सीटें हैं। अगर कल कांग्रेस विधानसभा के उपचुनाव में एक भी सीट जीतने में कामयाब हो गई, तो कांग्रेस की सरकार को ज्यादा खतरा नहीं रहेगा, लेकिन इसमें भी एक ट्विस्ट है। इस वक्त कांग्रेस के दो सीटिंग विधायकों ने लोकसभा चुनाव लड़ा है।
कांग्रेस यदि मंडी व शिमला संसदीय सीटों को जीत जाती है, तो विधानसभा में उनके पास विधायकों की संख्या 2 और कम हो जाएगी। कांग्रेस लोकसभा चुनावों में मौजूदा विधायकों को न उतारती, तो केवल 1 ही सीट की टेंशन थी, लेकिन मौजूदा विधायकों को उतारने के बाद अब तीन सीटों को जीतना उसके लिए अनिवार्य हो जाएगा और आने वाले समय में जब इन सीटों पर उपचुनाव होगा, तब कांग्रेस को जीत के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, वरना गेम पलट सकता है।
क्या कहते हैं आंकड़े
अब मान लीजिए कि कांग्रेस एक ही सीट लोकसभा की जीतती है, तब भी दूसरी बार जब उपचुनाव होगा, तो कांग्रेस को कड़ी मेहनत करनी ही पड़ेगी, क्योंकि सरकार का खेल तब भी खराब हो सकता है। इसके साथ ही एक स्थिती यह भी बन रही है कि मान लीजिए भाजपा कल 6 की 6 सीटें जीत जाती है, तो बीजेपी 25 से 31 पर पहुंच जाएगी।
कांग्रेस में अभी विधानसभा अध्यक्ष सहित विधायकों की संख्या 34 हैं। अब आने वाले समय में अगर 3 सीटों पर उपचुनाव होगा और कांग्रेस वो 3 सीटें अगर हार गई, तो भाजपा-कांग्रेस बराबरी पर आ सकती है। ऐसे में अगर बहुमत साबित करना पड़े, तो कांग्रेस के 33 विधायक सदन में मतदान कर सकेंगे। यानी कि सरकार के लिए स्थिती बिल्कुल सुरक्षित तब भी नहीं है, मगर बीजेपी को भी 10 विधायकों का साथ चाहिए।
अपनी बात साबित करने के लिए अब एक स्थिती यह भी है कि हिमाचल की दो सीटों पर मजबूत चेहरे के तौर पर निर्दलीय भी चुनाव लड़े हैं। इनमें से भी अगर कोई एत जीत जाता है, तो समीकरण फिर बदलेंगे। निर्दलीय का समर्थन फिर किसे मिलता है, तो कांग्रेस-बीजेपी का सत्ता में रहने की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है।
सुक्खू की मेहनत
दोनों दलों की बात की जाए तो भाजपा से ज्यादा कांग्रेस विधानसभा उपचुनाव को लेकर कड़ी मेहनत करती नजर आई है। जहां जयराम ठाकुर समेत बीजेपी के बड़े नेताओं का ज्यादातर फोकस लोकसभा के प्रचार पर रहा, तो वहीं दूसरी ओर सीएम सुक्खू ने उपचुनावों वाली सीटों पर खुद कई बार जनसभाएं कीं।
यही नहीं, स्टार प्रचारकों की भी यहां पर रैलियां करवाईं। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने भी कांग्रेस प्रत्याशियों की जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया है। देखना यह होगा कि अब कल जनता क्या फैसला सुनाती है।

