हिमखबर डेस्क
हिमाचल वही है, परंपराएं वही हैं, संस्कृति वही है। बदली है, तो सिर्फ सोच। आधुनिकता का इतना असर हुआ कि हमने अपन रीति-रिवाज, यहां तक कि खुद को ही बदल डाला।
अगर अपनी गौरवशाली संस्कृति और परंपराओं को सूली पर चढ़ाकर हम नए जमाने की पटरी पर जिंदगी दौड़ा रहे हैं, तो ऐसी आधुनिकता नहीं चाहिए।
ऐसा शहरीकरण नहीं चाहिए, जिसकी नींव ही परंपराओं और कल्चर को कुचल कर रखी हो। हम बात कर रहे हैं कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर, बिलासपुर सहित हिमाचल के अन्य भागों में मनाए जाने वाले देशी त्योहार ‘चीडऩू दी सगरांद’ की।
हिमाचल के इस देशी फेस्टिवल से शायद आज की पीढ़ी अनजान हो, लेकिन यह फेस्टिवल हिमाचल के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी धूमधाम से मनाया जाता है।
कहीं-कहीं इसे चिड़ाणु दी सग्रांद भी कहा जाता है, जिसे सावन महीने की संक्रांति को मनाया जाता है। चूंकी आज सावन महीने की संक्रांति है, तो हिमाचल में यह पर्व आज ग्रामीण क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाएगा। यह पारंपरिक लोक पर्व है, जो प्रकृति, कृषि और पशुधन के स्वास्थ्य से जुड़ा है।
क्यों मनाते हैं चिडाणु या चिडऩू पर्व
मूलत: यह पारंपरिक त्योहार पशुओं कि रक्षा के लिए मनाया जाता है। चिडाणु या चिडऩू पशुओं में कान के आसपास एक कीड़ा होता है। पशु मालिक इसकी पहचान आसानी से कर लेते हैं।
यह एक छोटे खटमल की तरह दिखता है। इस दिन लोग पशुओं से कुछ कीड़े इकट्ठे करते हैं और शाम को उन कीड़ों को आटे के पेड़े में मिलाकर जंगल में जलाते हैं।
इस दौरान गांव के लोग एकट्ठा होते हैं और चीडऩू जलाने के वक्त गीत गाते हैं। साथ ही उस आग पर छलांग लगाकर आर-पार करते हैं। मान्यता है कि इस पर्व के बाद पशु साल भर स्वस्थ रहते हैं।
हर घर में बनते हैं लजीज पकवान
इस दिन भगवान की पूजा भी होती है। लोग अपने अपने घरों बढिय़ा पकवान बनाते हैं। जैसे आलू-पूरी, तली रोटिंया, खीर, मीठे नमकीन बबरू या गुलगुले। और एक-दूसरे को बांटते हैं।
हर जिला में इसे अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है, लेकिन यह पर्व हिमाचल की परंपरा से जुड़ा हुआ है, जिसे ग्रामीण क्षेत्र आज भी संजोए हुए हैं।

