समाधि में लीन हुई माई ‘मिच्ची देवी’, संक्राति पर अनुयायी मायूस

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100 बरस की संघर्षशील महिला ने सफाई कर्मी के पद से सेवानिवृत होकर ले लिया था सन्यास।

सिरमौर – नरेश कुमार 

चूड़धार चोटी की तलहटी में चौपाल उपमंडल के संराह में वीरवार को संक्राति के मौके पर मायूसी थी। करीब 100 साल की माई ‘मिच्ची देवी’ को अपने बीच न पाकर अनुयायी मायूस थे। हालांकि चूड़धार चोटी से बहने वाले खड्ड के किनारे माई मिच्ची देवी शनिवार को समाधि में लीन हो गई थी।

एक संघर्षशील महिला के बाद सन्यासी का जीवन व्यतीत करने वाली माई ‘मिच्ची देवी’ ने करीब 100 साल की उम्र में जीवन को त्यागा है। संराह के अलावा वो चूड़धार चोटी पर भी रहा करती थी।

माई मिच्ची देवी ने शिक्षा विभाग से बतौर सफाई कर्मचारी सेवानिवृत होने के बाद चोला धारण कर लिया था। इसके साथ ही ऋषिकेश के टाटवाला आश्रम की शिष्य बन गई थी।

इलाके के संत समाज के अलावा पारिवारिक सदस्य माई ‘मिच्ची देवी’ के संसार त्यागने की तमाम औपचारिकताओं को ठीक वैसे ही पूरा किया जा रहा है, जैसा कि संतों के लिए होता है।

पारिवारिक जानकारी के मुताबिक 5 से 7 रुपए की दिहाड़ी करने वाली मिच्ची देवी ने शिक्षा विभाग में एक सफाई कर्मी के तौर पर सेवाएं प्रदान की।

जंगलों से लकड़ियां चुना करती थी, साथ की गुच्छियों को इकट्ठा कर बाजार में बेचा करती थी, ताकि तीन बेटांे व दो बेटियों के जीवन का लालन-पोषण कर सके।

पोते संतोष कुमार की मानें तो जीवन में उनकी दादी ने 11 घरों का निर्माण किया। संसार में अंतिम सांस लेने के दौरान भी वो अपने अनुयायियों की मनोकामना पूरी करने के लिए प्रार्थना में लीन रहती थी।

चूड़धार चोटी पर जाने वाले श्रद्धालु माई मिच्ची देवी से बखूबी परिचित हैं। परिवार का कहना है कि संतों के समाज में दाखिल होने के लिए जब कोई चोला पहन लेता है तो पिंडदान समझ लिया जाता है।

संतोष कुमार का कहना है कि 1991 के बाद घर की मोह माया को छोड़ दिया था। शनिवार को समाधि में लीन होने के दौरान बड़ी संख्या में शिष्य मौजूद थे।

वैसे तो आधार कार्ड के मुताबिक उनकी उम्र लगभग 100 साल थी, लेकिन परिवार का कहना है कि वो लगभग 110 साल की थी।

संतोष कुमार के मुताबिक हरिद्वार के कनखल में भी उनकी दादी की समाधि से जुड़ी तमाम रिवायतों को अगले कुछ दिनों में पूरा किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि हर साल सक्रांति के मौके पर वो संराह में ही एक छोटी सी कुटिया में रहकर शिष्यों से मिला करती थी।लेकिन इस बार सक्रांति से चंद रोज पहले वो समाधि में लीन हो गई।

उनका कहना है कि परिवार के लिए ताउम्र संघर्ष करने के बाद आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाली माई मिच्ची देवी की स्मृति हमेशा परिवार के जहन में ताजा रहेगी।

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