धर्मशाला में DC ऑफिस के बाहर आशा वर्कर्ज का हल्ला बोल, सरकार से मांगा नियमित कर्मचारी का दर्जा

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे अहम कड़ी मानी जाने वाली आशा वर्कर्ज अब अपने हकों के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गई हैं। अपनी लंबित मांगों और आर्थिक शोषण के खिलाफ आशा वर्कर्ज ने भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले डीसी कांगड़ा कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन किया।

सुबह करीब 10:30 बजे शुरू हुआ यह धरना दोपहर 2 बजे तक चला, जिसमें भारी संख्या में पहुंचीं आशा वर्करों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। धरना समाप्त होने के बाद आशा वर्कर्ज के एक प्रतिनिधिमंडल ने डीसी कांगड़ा के माध्यम से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के नाम एक मांग पत्र सौंपा।

इस ज्ञापन में स्पष्ट मांग की गई है कि आशा वर्कर्ज को वर्षों की सेवा के बाद अब नियमित कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। इसके अलावा नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा, पैंशन, ईपीएफ-ईएसआई और यात्रा भत्ता जैसी बुनियादी सुविधाएं तुरंत बहाल करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई।

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आशा वर्कर ललिता ने बताया कि उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता है। इतने महत्वपूर्ण और जमीनी स्तर के काम के बावजूद उन्हें वेतन के बजाय केवल प्रोत्साहन राशि के भरोसे छोड़ दिया गया है, जिससे आज के महंगाई के दौर में घर चलाना नामुमकिन हो गया है।

आशु ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि आशा वर्कर्ज से स्वास्थ्य विभाग के अलावा अन्य कई विभागों के काम भी लिए जाते हैं, लेकिन उसके अनुसार कोई सुविधा नहीं दी जाती। सरकार को काम के बोझ को देखते हुए एक उचित और पक्का वेतन तय करना चाहिए।

सुनीता ने बताया कि ड्यूटी के दौरान उन्हें कई बार दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में पैदल जाना पड़ता है, लेकिन सरकार की तरफ से कोई यात्रा भत्ता नहीं मिलता। इससे उन्हें हर महीने अपनी जेब से आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है।

धरने में मौजूद अन्य वर्कर्ज ने एक सुर में कहा कि वे कई वर्षों से दिन-रात जनता की सेवा कर रही हैं, लेकिन आज तक उन्हें कोई स्थायी पहचान या भविष्य की सुरक्षा नहीं मिली है। सरकार उन्हें तुरंत नियमित कर्मचारी का दर्जा दे।

इस धरने को समर्थन देने पहुंचे भारतीय मजदूर संघ के प्रदेशाध्यक्ष मदन सिंह राणा ने आशा वर्करों की आवाज को बुलंद किया। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि आशा वर्कर्ज प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ हैं।

कोरोना काल से लेकर पल्स पोलियो तक, हर जगह इन्होंने मोर्चे पर काम किया है, लेकिन विडंबना देखिए कि आज भी इन्हें उचित वेतन और सुविधाओं से महरूम रखा गया है। सरकार को इनकी मांगें तुरंत माननी चाहिए।

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