हिमाचल प्रदेश: किन्नौर में बड़ा जलवायु संकट, जमीन के नीचे की बर्फ पिघली, बढ़ा भूस्खलन और बाढ़ का खतरा

--Advertisement--

हिमखबर डेस्क

किन्नौर में कई दशकों से तापमान बढ़ने के कारण भूमि के भीतर स्थायी रूप से जमी बर्फ (पर्माफ्रॉस्ट) पिघलने लगी है। इससे भूस्खलन और आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। जिले में जलवायु परिवर्तन को लेकर मई 2026 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनपीजे नेचुरल हजार्ड्स में शोध प्रकाशित हुआ है। इसमें कहा गया है कि बढ़ता तापमान पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।

किन्नौर में पर्माफ्रॉस्ट से उत्पन्न संभावित भूस्खलन एवं ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जोखिमों पर आईआईटी भुवनेश्वर के पृथ्वी, महासागर एवं जलवायु विज्ञान विद्यालय के शोधकर्ताओं अभिनव अलंगदान और आशीम सत्तार ने अध्ययन किया है।

अध्ययन में पाया गया कि 1951 से 2024 के बीच जिले में औसत तापमान बढ़ा है। तापमान में वृद्धि की दर 0.016 से 0.019 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष के बीच है। इस अध्ययन में 660 गांवों का भी विश्लेषण किया गया। कई गांव ऐसी जगह हैं, जहां जमीन के नीचे जमी हुई बर्फ है।

पर्माफ्रॉस्ट क्षरण से उत्पन्न हिमस्खलन या चट्टानी धंसाव झील विस्फोटक बाढ़ को जन्म दे सकता है। ऐसा होने पर बाढ़ का पानी 16 से 18 मिनट में जलविद्युत परियोजना तक पहुंच सकता है। ऐसे में पर्माफ्रॉस्ट क्षेत्रों की निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों के विस्तृत मानचित्रण पर जोर दिया गया है।

काशंग झील 11 गुना बढ़ी

शोध में सात ऐसी झीलों की पहचान की गई, जो पर्माफ्रॉस्ट क्षरण वाले क्षेत्रों में हैं। इनमें काशंग झील को सबसे अधिक जोखिम वाली बताया गया है। अध्ययन में 1976 से 2024 तक के उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया गया है। 1976 में झील का क्षेत्रफल लगभग 33 हजार वर्गमीटर था। ये 2024 तक बढ़कर 3.56 लाख वर्गमीटर से अधिक हो गया।

यानी लगभग 11 गुना विस्तार हुआ है। झील का जल भंडार लगभग 86 लाख घनमीटर है। इसके नीचे काशंग जलविद्युत परियोजना है। किन्नौर की कई सड़कें, पुल और ढांचागत परियोजनाएं पर्माफ्रॉस्ट वाले इलाके में हैं। अगर बर्फ पिघली तो ये परियोजनाएं खतरे की जद में आ सकती हैं। पर्माफ्रॉस्ट वाले इलाके में भारत-तिब्बत सीमा की ओर जाने वाली कुछ सड़कें भी हैं।

 पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण विभाग के बोल

पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से जलवायु परिवर्तन जोखिम बन चुका है। वैज्ञानिक निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणालियों और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है।

--Advertisement--
--Advertisement--

Share post:

Subscribe

--Advertisement--

Popular

More like this
Related

“बड़ी खुशखबरी! कर्मचारियों को मिला बड़ा तोहफा, 2 साल की सेवा पूरी करने वाले क्लर्क और JOA IT होंगे रेगुलर

हिमाचल प्रदेश के उच्च शिक्षा संस्थानों सहित स्कूलों, कार्यालयों, कॉलेजों,...

भरमाड़-भगवाल, सुदरां उठाऊ पेयजल योजना की दो मोटरें और 100 मीटर तार ले उड़े चोर

ज्वाली - शिवू ठाकुर विधानसभा क्षेत्र ज्वाली में चोरियों...