गिरिपार की लड़की की जिद ने कान्स में गाड़ा “खूंटा”, दुनिया देखेगी “पहाड़” की आत्मा

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश के गिरिपार क्षेत्र शिलाई के दुर्गम गांव द्राबिल की 32 वर्षीय अनुशी शर्मा ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना कभी हिमाचल ने भी नहीं की थी। सीमित संसाधनों, संघर्षों और अनगिनत मुश्किलों के बीच इस युवा लेखिका, अभिनेत्री और निर्देशक ने अपनी फिल्म “खूंटा” को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में से एक “कांन्स फिल्म फेस्टिवल” तक पहुंचाकर इतिहास रच दिया है।

“खूंटा”, सिर्फ एक फिल्म की कहानी नहीं है…बल्कि अनुशी के संघर्ष, जिद और सपने की कहानी है। सिरमौर की मिट्टी, पहाड़ों की संवेदनाओं, देव संस्कृति और प्रकृति से प्रेम की उस आवाज़ का वैश्विक मंच तक पहुंचाया, जिसे लंबे समय तक अनदेखा किया गया।

अनुशी ने बताया कि यह कोई साधारण प्रेम कहानी नहीं है। फिल्म में एक ऐसी महिला की आध्यात्मिक और भावनात्मक यात्रा दिखाई गई है, जो अपने लापता पति की प्रतीक्षा करती है। कहानी केवल प्रतीक्षा तक सीमित नहीं रहती।

यह प्रकृति, विरासत, आस्था और विनाश के बीच के उस संघर्ष को सामने लाती है, जिसे हिमालय के गांव हर दिन महसूस करते हैं। यह प्रकृति से प्रेम की कहानी है,  एक नदी की कहानी है, उन पहाड़ों की कहानी है, जहां आज भी देवता महासू महाराज आस्था के सबसे बड़े केंद्र हैं।

खूंटा के निर्माता मुकेश मोदी और यूनिट

फिल्म में हाटी संस्कृति, जौनसार की परंपराएं और गद्दी समुदाय की जीवनशैली को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा गया है। फिल्म दिखाती है कि कैसे नदी जीवन देती है, परंपराएं समाज को जीवित रखती हैं…लेकिन जब प्रकृति विनाश पर उतरती है, तो वह सब कुछ बदल सकती है और यही “खूंटा” का मूल भाव है।

अनुशी शर्मा ने इस फिल्म को न सिर्फ लिखा और निर्देशित किया, बल्कि उसे जिया है। फिल्म के हर दृश्य में सिरमौर की मिट्टी की खुशबू है। गांवों की सादगी, पहाड़ी संस्कृति, देव परंपराएं और हिमालय की आध्यात्मिकता इतनी खूबसूरती से दिखाई गई है कि यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हिमाचल की आत्मा का प्रतिबिंब बन जाती है।

अनुशी शर्मा के शब्दों में दर्द भी है और जिद भी। उनका कहना है कि जिस सिरमौर को हमेशा विकास और पहचान के मामले में सबसे पीछे आंका गया, उसे दुनिया के नक्शे पर स्थापित करना उनका सपना है।

वह कहती हैं कि सिरमौर ने दुनिया को कई प्रतिभाशाली लोग दिए, लेकिन इस क्षेत्र को वह सम्मान और पहचान कभी नहीं मिली, जिसका वह हकदार था। यही वजह है कि उन्होंने अपनी कहानी के केंद्र में अपने पहाड़, अपने गांव और अपनी संस्कृति को रखा।

वो चाहती हैं कि हिमाचल की भी अपनी एक मजबूत फिल्म इंडस्ट्री हो, जहां स्थानीय कलाकारों, लेखकों और युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले, ताकि उन्हें पहचान पाने के लिए अपने प्रदेश और अपनी जड़ों से दूर न जाना पड़े।

मुंबई  से  कान्स तक का संघर्ष….  

शिलाई और सोलन में पढ़ाई पूरी करने के बाद अनुशी ने भीड़ का हिस्सा बनकर साधारण नौकरी करने के बजाय कुछ अलग करने का फैसला लिया। बीएससी के बाद उन्होंने थिएटर की दुनिया चुनी। सोलन के थिएटर ग्रुप्स में काम करते हुए उन्होंने 5 साल अपनी कला को निखारा और फिर सपनों के शहर मुंबई का रुख किया।

बिना किसी गॉडफादर, बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के, उन्होंने सालों तक संघर्ष किया। रिजेक्शन मिले, मुश्किलें आईं, लेकिन हार नहीं मानी। टीवी इंडस्ट्री में काम करते हुए भी उनके भीतर पहाड़ों की आवाज़ लगातार गूंजती रही। वही आवाज़ आगे चलकर “खूंटा” बनी।  उनकी यही जिद आज उन्हें कान्स फिल्म फेस्टिवल तक ले गई है।

परिवार बना सबसे बड़ी ताकत….

अनुशी मानती हैं कि परिवार के सहयोग के बिना यह सफर संभव नहीं था। फिल्म की शूटिंग सिरमौर के द्राबिल, कुआनु और आसपास के गांवों में करीब एक महीने तक चली, जहां पूरी यूनिट ने स्थानीय लोगों के बीच रहकर काम किया।

इस दौरान उनके माता-पिता, भाई-बहनों और गांव के लोगों ने हर कदम पर उनका साथ दिया। गांवों के लोगों ने अपने घर, पारंपरिक वस्त्र और धार्मिक अनुष्ठान फिल्म के लिए उपलब्ध कराए, जिससे फिल्म की वास्तविकता और गहराई और मजबूत हुई।

अनुशी ने बताया कि न्यूयॉर्क बेस्ड इंडियन-अमेरिकन निर्माता मुकेश मोदी इस प्रोजेक्ट से तब जुड़े जब उन्होंने अनुशी की स्क्रिप्ट पढ़ी। मोदी स्क्रिप्ट से प्रभावित हुए और  अनुशी की सोच और हिमाचल की सांस्कृतिक गहराई को समझते हुए इस परियोजना को समर्थन दिया। करीब एक करोड़ से अधिक लागत से बनी यह फिल्म पूरी तरह हिमाचल के ग्रामीण परिवेश में शूट की गई है। कुआनु समेत सिरमौर के कई क्षेत्रों में करीब एक महीने तक शूटिंग चली, जहां पूरी यूनिट स्थानीय लोगों के बीच रही।

अनुशी ने बताया की फिल्म में कोई चमक-दमक वाला स्टारडम नहीं है। “खूंटा” का असली नायक खुद हिमालय, उसकी नदियां, मंदिर, परंपराएं, खामोशी और संघर्ष है। फिल्म में स्थानीय बोली, पारंपरिक परिधान और धार्मिक अनुष्ठानों को पूरी प्रामाणिकता के साथ दिखाया गया है।

यही वजह है कि यह फिल्म केवल सिनेमा नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करने का प्रयास भी बन गई है। अनुशी चाहती हैं कि हिमाचल की अपनी एक मजबूत फिल्म इंडस्ट्री हो, जहां स्थानीय युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले और उन्हें सपने पूरे करने के लिए मुंबई की भीड़ में खोना न पड़े।

कान्स में हिमाचल की पहली फिल्म…

16 मई 2026 को जब “खूंटा” का प्रीमियर कांन्स फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में हुआ, तो वह केवल एक स्क्रीनिंग नहीं थी। वह हिमाचल प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। हिमाचल की पहली ऐसी फिल्म बनी, जिसे कान्स फिल्म मार्केट प्रीमियर में जगह मिली। अनुशी शर्मा के लिए यह पल भावुक कर देने वाला था। शिलाई के एक छोटे गांव से निकलकर कान्स के रेड कार्पेट तक पहुंचना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था।

बता दें कि कान्स फिल्म फेस्टिवल दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और बड़े अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में से एक है, जो हर साल फ्रांस के शहर कान्स में आयोजित होता है। यह मंच दुनिया भर की बेहतरीन फिल्मों, कलाकारों और फिल्मकारों को वैश्विक पहचान देता है, इसलिए यहां चयनित होना किसी भी फिल्म के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

सितंबर में रिलीज होने की संभावना…

करीब एक करोड़ रुपये की लागत से बनी इस फिल्म के सितंबर तक रिलीज होने की संभावना है। फिल्म में जवाहर कौल, कार्तिक राव, आशु घनश्याम, प्रेरणा ठाकुर, ईशान आज़ाद, शुभम सेठी, मनोज बलिया, वरुणकांत, रिशान वर्मा और प्रणय कोली जैसे कलाकार नजर आएंगे।

फिल्म के गीतों में हिमाचल की लोक आत्मा को आवाज़ देने का काम अजय चौहान ने किया है। वहीं क्रिएटिव डायरेक्टर हृतिक्का सिंह कंवर, आर्ट डायरेक्टर याशिका कालरा और डीओपी विजय चंद ठाकुर ने फिल्म को दृश्यात्मक रूप से बेहद जीवंत बनाया है।

पहाड़ की बेटी ‘अनुशी शर्मा’  केवल एक फिल्ममेकर नहीं, बल्कि उस नई पहाड़ी सिनेमाई पहचान की प्रतीक बन चुकी हैं, जो दुनिया को यह बताना चाहती है कि हिमालय केवल खूबसूरत दृश्य नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्षों और संस्कृति की जीवित दुनिया है।

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