बिलासपुर – सुभाष चंदेल
जिन घरों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजने की आस अधूरी थी, अब वहां आवाज लौट रही है। जिन मासूम चेहरों पर शब्दों की कमी खामोशी बनकर छाई रहती थी, वे अब ध्वनियों को महसूस कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में एम्स बिलासपुर उम्मीद की ऐसी ही नई सुबह लेकर आया है।
संस्थान में अब तक 11 ऐसे बच्चों के सफल कोक्लीयर इम्प्लांट ऑपरेशन हुए हैं, जो जन्म से सुनने और बोलने में असमर्थ थे। अब ये बच्चे न केवल ध्वनियां सुन पा रहे हैं, बल्कि उनके वाक और भाषा विकास भी तेजी से हो रहा है। एम्स में मंगलवार को विश्व श्रवण दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम हुआ।
कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में सुनने की अक्षमता की समय पर पहचान और उपचार को लेकर समाज में जागरूकता फैलाना रहा। कार्यक्रम में ईएनटी के विभागाध्यक्ष डॉ. सुदेश कुमार ने इस उपलब्धि को साझा किया।
कार्यक्रम में कोक्लीयर इम्प्लांट वाले बच्चों के लिए विशेष मनोरंजक और संवादात्मक गतिविधियां भी आयोजित की गईं। इस दौरान जब बच्चे मुस्कुराते हुए खेलते, इशारों की जगह शब्दों से प्रतिक्रिया देते दिखे, तो कई माता-पिता की आंखें नम हो गईं।
वर्षों की चिंता, डर और खामोशी उस पल उम्मीद और विश्वास में बदलती नजर आई। इस अवसर पर संस्थान के शीर्ष अधिकारी प्रो. रूपाली पार्लेवार, डॉ. अनुपम पाराशर और डॉ. निधि पुरी भी मौजूद रहीं।
एम्स के कार्यकारी निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) दलजीत सिंह ने कहा कि एम्स बिलासपुर क्षेत्र के हर बच्चे तक समावेशी, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण श्रवण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि संस्थान का लक्ष्य केवल इलाज नहीं, बल्कि बच्चों को आत्मनिर्भर और समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। ईएनटी के विभागाध्यक्ष डॉ. सुदेश कुमार के साथ एसोसिएट प्रो. डॉ. सुमीत अंगराल, एसोसिएट प्रो. डॉ. नेहा चौहान और असिस्टेंट प्रो. डॉ. निधिन दास न्यूरो-ऑटोलॉजी में प्रशिक्षित हैं।
संस्थान में नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग, ऑडियोलॉजिकल सेवाएं, टाइम्पैनोप्लास्टी, मास्टोइडेक्टोमी, ओसीकुलोप्लास्टी, स्टेप्स सर्जरी और मिडिल ईयर व लैटरल स्कल बेस की एडवांस सर्जरी की सुविधाएं दी जा रही हैं।

