देवशयनी एकादशी पर भूरेश्वर महादेव मंदिर में निभाई गई खतरनाक रिवायत

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सिरमौर – नरेश कुमार राधे

हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली देवशयनी एकादशी 17 जुलाई को थी। इस दिन भगवान विष्णु के शयन में जाने की कथा प्रचलित है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागते हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में जाने के बाद सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं।

इस मौके पर हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला के सराहां उपमंडल के प्राचीन भूरेश्वर महादेव मंदिर में देव परंपरा को निभाया गया। मौसम खराब होने के बावजूद देवता ने खतरनाक चट्टान से कारदारों व श्रद्धालुओं को दर्शन दिए।

बता दें कि इस चट्टान से फिसलने का मतलब है, एक हजार फीट नीचे खाई में गिरना। इसके बाद देवगयास तक देवयात्राओं पर भी प्रतिबंध लग गया है। मूल रूप से देवता के प्राचीन श्रृंगार छत्र, चंवर, त्रिशूल और देवता की पगड़ी मुख्य देव को लगती है।

शिला पर दर्शन के दौरान देवता के हाथ में त्रिशूल भी होता है। किवदंती है कि शिव-पार्वती ने इस स्थान से ही कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध देखा था। हालांकि, देवता का मुख्य उत्सव देव गयास को होता है, लेकिन देवता द्वारा समाज में अपनी यात्राओं को बंद करने से पहले शिला पर दर्शन दिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों व भू-लिंगों के इतिहास में स्वयंभू लिंग कालांतर में भूरी श्रृंग, यहां दुग्धाहारी भुरेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

प्रमुख देवा डॉ मनोज शर्मा ने बताया कि यहां के पुजारी शैव ब्राह्मण होते हैं, जो पुरोहित का कार्य करते हैं। 22 उपगोत्रों में कोई विवाह नहीं होता। मात्र भाई-बहन के रिश्ते होते हैं। अष्टमी की रात्रि ढाई बजे प्राचीन नियम व परंपराओं के साथ पुजारली गांव से पैदल 6 किलोमीटर दूर कवाल नदी से विशेष पूजा के बाद छू का कार्य करते हैं।

फिर नवमी की रात को रात्रि जागरण करते हैं। चावथिया खेल, जिसमें अपने देवता की शक्ति परीक्षण के लिए आग की लौ देकर देवता के आगमन के समय देवता का चंवर झुलाया जाता है। जिस कारण उपगोत्र का नाम चावथिया पड़ा। अर्ध रात्रि को शिला विशेष के ऊपर की व्यवस्था देव आदेश के मुताबिक करवाता है।

मेहंदो बाग गांव की मेहन्दू खेल जो मंदिर की तलहटी पर लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, देवता से अर्ध रात्रि में शिला पर छलांग का कार्य विशेष करवाते हैं। इस अवसर पर अपना इतिहास दोहराते हुए लगभग 10 वाणियों या आवाजों में अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। संतान प्राप्ति की मनोकामना जरूर पूरी करते हैं।

मूल रूप से देवता के प्राचीन श्रृंगार छत्र, चंवर, त्रिशूल और देवता की पगड़ी मुख्य देव को लगती है। देवशयनी से लेकर देवगयास तक अपनी प्रजा में देव यात्रा बंद हो जाती है, कुछ मुख्य कार्य प्रजा के पुजारी अपने घर पर ही करते हैं।

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