सीमेंट की बोरी उठाने वाले को 4500 तो स्कूल में घंटी बजाने वाले को 5625 मानदेय : प्रीतम सिंह

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शिमला 09 फरवरी – नितिश पठानियां

लोक निर्माण विभाग में तैनात मल्टी टास्क वर्कर्स शिक्षा विभाग में नियुक्त मल्टी टास्क वर्कर्स से कम वेतन मिलने से क्षुब्ध हैं। बता दें कि पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल में शिक्षण संस्थानों और लोक निर्माण विभाग में हजारों मल्टी टास्क वर्कर्स नियुक्त किए गए थे। जिनके मानदेय में काफी भिन्नता होने से लोक निर्माण विभाग में तैनात मल्टी टास्क वर्कर्स के साथ बहुत अन्याय हुआ है।

गौर रहे कि पूर्व सरकार के कार्यकाल में शिक्षण संस्थानों में नियुक्त किए गए मल्टी टास्क वर्कर्स  को 5625 रुपए और लोक निर्माण विभाग में नियुक्त किए किए मल्टी टास्क वर्कर्स को 4500 रुपए प्रतिमाह मानदेय निर्धारित किया गया है।

सामाजिक कार्यकर्ता प्रीतम सिंह ठाकुर का कहना है कि जिस मजदूर को प्रतिकूल मौसम में दिनभर सड़कों पर काम करना पड़ता है, उन्हें 4500 रुपए दिया जाना, इस वर्ग के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। इनका कहना है कि शिक्षण संस्थान में मल्टी टास्क वर्कर्स स्कूल के तीन किलोमीटर के दायरे में नियुक्त किए गए हैं।

इनकी ड्यूटी भी एक ही स्कूल में लगाई गई है और इनका कार्य समय भी प्रातः 10 बजे से चार बजे तक है। जबकि लोक निर्माण विभाग में तैनात मल्टी टास्क वर्कर्स को प्रतिकूल परिस्थितियों में जगह-जगह सड़कों की मरम्मत करने के लिए प्रातः 9 बजे से सांय 05 बजे तक ड्यूटी देनी पड़ रही है।

लोक निर्माण विभाग में तैनात अनेक मल्टी टास्क  वर्कर्स ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि उनका साक्षात्कार भी सीमेंट की बोरी उठाने से हुआ था। इसके बावजूद भी स्कूल में लगे मल्टी टास्क वर्कर्स से 1125 रुपए प्रतिमाह कम पैसे मिल रहे हैं, जबकि स्कूल में मल्टी टास्क वर्कर्स के लिए कोई भारी कार्य भी नहीं है।

हैरत इस बात से है कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों द्वारा कभी भी इस मुददे को सरकार के समक्ष नहीं रखा गया है न हीे इस गरीब मजदूर तबके के लोगों के पक्ष में कोई आवाज उठाने वाला भी नहीं है। यह वर्ग अन्याय की इस चक्की में पिसते जा रहे हैं।

प्रीतम ठाकुर ने बताया कि लोक निर्माण विभाग में तैनात मल्टी टास्क वर्कर्स के मानदेय में बढ़ोतरी करके इन्हें शिक्षा विभाग में नियुक्त एमटीडब्लु के समकक्ष लाया जाए, ताकि इस वर्ग का शोषण न हो।

लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों से जब इस बारे बात की गई। उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह विसंगति पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुई है, जिसे वर्तमान सरकार ठीक कर सकती है।

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