हिमखबर डेस्क
सिरमौर की शांत वादियों में बसा छोटा सा गांव सुरला आज भी अपने उस वीर सपूत को गर्व और नम आंखों के साथ याद करता है, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। भारतीय सेना की 15वीं डोगरा रेजीमेंट के बहादुर जवान नायक राजेंद्र सिंह की शहादत को भले ही दो दशक बीतने को हों, लेकिन उनकी वीरगाथा आज भी गांव की हवाओं में गूंजती है।
वर्ष 1976 में एक साधारण परिवार में जन्मे राजेंद्र सिंह के लिए देशभक्ति कोई सीखी हुई भावना नहीं थी, बल्कि यह उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता स्वर्गीय मंगल सिंह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त थे, जबकि माता स्वर्गीय भगवती देवी ने अपने बच्चों में संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम की भावना का संचार किया। बचपन से ही राजेंद्र के मन में सेना की वर्दी पहनकर देश सेवा करने का सपना था।
अपने सपनों को साकार करते हुए वर्ष 1994 में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने भारतीय सेना जॉइन कर ली। अपनी निडरता, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वह जल्द ही 15वीं डोगरा रेजीमेंट के भरोसेमंद सैनिकों में शामिल हो गए। साथियों के बीच वह एक साहसी और समर्पित सैनिक के रूप में पहचाने जाते थे।
नवंबर 2000 में उनका विवाह सुमन बाला से हुआ। परिवार में खुशियां आईं और समय के साथ एक बेटी और एक बेटे का जन्म हुआ। जीवन खूबसूरत ढंग से आगे बढ़ रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
3 सितंबर 2006 का दिन परिवार के लिए कभी न भूलने वाला बन गया। जम्मू-कश्मीर के मंडी नाला क्षेत्र में ऑपरेशन रक्षक के दौरान अपनी ड्यूटी निभाते हुए राजेंद्र सिंह की सैन्य गाड़ी विस्फोट की चपेट में आ गई। देश की सुरक्षा के लिए अग्रिम मोर्चे पर तैनात यह वीर जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गया।
शहादत की खबर जैसे ही सुरला गांव पहुंची, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उस समय उनकी बेटी महज पांच वर्ष और बेटा तीन वर्ष का था। पत्नी सुमन बाला और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जब तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो हजारों लोगों की आंखें नम थीं और पूरा क्षेत्र एक स्वर में गूंज उठा।
“शहीद राजेंद्र सिंह अमर रहें”
“भारत माता की जय”
उनके भाई जयवीर सिंह आज भी उस दिन को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं, “राजेंद्र सिर्फ हमारा भाई नहीं था, वह पूरे देश का बेटा था। उसकी याद आज भी दिल को गर्व और आंखों को नम कर देती है।”
आज भले ही नायक राजेंद्र सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका बलिदान, उनकी बहादुरी और देशभक्ति की मिसाल आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। सुरला गांव का यह वीर सपूत हमेशा के लिए अमर हो चुका है। जब-जब तिरंगा लहराएगा, तब-तब राजेंद्र सिंह जैसे वीरों की शहादत को देश नमन करता रहेगा।

