हिमाचल में 8 साल से कोमा में बिस्तर पर संजीव! जयराम ने दिया था ‘सहारा’, सुक्खू सरकार ने वो भी छीना, पत्नी की मदद की गुहार

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हिमखबर डेस्क 

आठ साल से संजीव बिस्तर में लाचार पड़े हैं। इलाज में सारी जमापूंजी लग चुकी है। जयराम सरकार ने सहारा योजना शुरू की थी, अब उसे सुक्खू सरकार में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। परिवार के सामने बड़ी चुनौती है और जिंदगी की जंग जारी है। मामला हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला के हरोली उपमंडल का है।

संजीव कुमार और उनके परिवार की कहानी मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली है

दरअसल, लूथड़े गांव से सामने आई संजीव कुमार और उनके परिवार की कहानी मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली है। पिछले आठ वर्षों से कोमा में पड़े 48 वर्षीय संजीव कुमार बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं, जबकि उनकी पत्नी मोनिका और 42 प्रतिशत दिव्यांग बेटा मोहित शर्मा उम्मीद का दामन थामे दिन-रात उनकी सेवा में जुटे हैं।

परिवार की पूरी जमापूंजी इलाज में खर्च हो चुकी है और अब आर्थिक तंगी इस परिवार की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। सरकार की सहारा योजना से मिलने वाली पेंशन भी पिछले एक वर्ष से बंद पड़ी है, जिससे हालात और अधिक कठिन हो गए हैं।

बावजूद इसके, पत्नी और बेटे ने हार नहीं मानी है. अब यह परिवार समाज और सरकार से केवल एक सहारे की उम्मीद लगाए बैठा है।

मोनिका ने बताया कि करीब आठ वर्ष पहले उनके पति संजीव कुमार डिप्रेशन से जूझ रहे थे। इसी दौरान एक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जिसके बाद उनकी हालत गंभीर हो गई और वह कोमा में चले गए।

उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती करवाया गया, जहां लंबे समय तक इलाज चला, लेकिन बाद में डॉक्टरों ने उन्हें घर ले जाकर सेवा करने की सलाह दे दी। तब से लेकर आज तक संजीव बिस्तर पर हैं और पूरा परिवार उनकी देखभाल में लगा हुआ है।

मोनिका ने बताया कि पति के इलाज के लिए जो भी बचत थी, वह सब खर्च हो चुकी है। यहां तक कि रिश्तेदारों और परिचितों से भी मदद लेनी पड़ी, लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि रोजमर्रा के खर्च और दवाइयों का इंतजाम करना भी मुश्किल हो गया है।

उन्होंने कहा कि हर महीने करीब पांच हजार रुपये दवाइयों और देखभाल पर खर्च होते हैं, लेकिन आमदनी का कोई स्थायी साधन नहीं है। परिवार के पास अपना घर तक नहीं है और वे भाई-बंधुओं के घर में रहकर जीवनयापन कर रहे हैं।

मोनिका ने बताया कि सरकार की सहारा योजना से उन्हें दो हजार रुपये मासिक पेंशन मिलती थी, जिससे दवाइयों के खर्च में कुछ राहत मिल जाती थी लेकिन पिछले एक वर्ष से यह पेंशन बंद है, जिससे परिवार की परेशानियां और बढ़ गई हैं।

उन्होंने कहा कि कई बार संबंधित विभागों के चक्कर काटे, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो पाया। मोनिका की आंखें नम हो जाती हैं, जब वह कहती हैं कि आठ वर्षों में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन उनका विश्वास नहीं टूटा।

उन्होंने कहा कि पति को इस हालत में छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। वह आज भी पूरे समर्पण से उनकी सेवा कर रही हैं और चाहती हैं कि सरकार और समाज उनके परिवार की पुकार सुने।

संजीव कुमार के परिवार की यह कहानी केवल एक परिवार के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उन सरकारी योजनाओं की हकीकत भी सामने लाती है, जो जरूरतमंदों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहीं। अब यह परिवार मदद की आस में है और उम्मीद कर रहा है कि उनकी यह आवाज जिम्मेदार तंत्र और समाज तक पहुंचे।

संजीव के बेटे मोहित शर्मा स्वयं 42 प्रतिशत दिव्यांग हैं। वह बताते हैं कि पिता की हालत को देखते हुए उन्होंने बचपन से ही संघर्षों के बीच जीवन बिताया है। उन्होंने कहा कि परिवार ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। हर दिन यही सोचकर सेवा करते हैं कि शायद एक दिन पिता आंखें खोलें और पहले की तरह परिवार के साथ खड़े हों।

मोहित ने कहा कि आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने पिता की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। मोहित शर्मा ने कहा कि परिवार किसी तरह की बड़ी मांग नहीं कर रहा, केवल इतना चाहता है कि सहारा योजना की बंद पेंशन फिर से शुरू हो, पिता के इलाज के लिए आर्थिक सहायता मिले और यदि संभव हो तो बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाई जाए।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार और समाज से थोड़ा सहयोग मिल जाए तो शायद उनके पिता के इलाज में नई उम्मीद जग सकती है।

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