हिमाचल की बेटी का कारनामा, माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली बनी दुनिया की पहली दृष्टिबाधित महिला

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की हंगरंग घाटी के चांगो गांव की बेटी छोंजिन आंगमो ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर न सिर्फ अपने परिवार और गांव का, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन कर दिया है। 29 वर्षीय दृष्टिबाधित पर्वतारोही आंगमो भारत की पहली और विश्व की पांचवीं दृष्टिबाधित पर्वतारोही बनीं, जिन्होंने 19 मई 2025 की सुबह 8:34 बजे एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि का वीडियो जब उनके पिता अमर चंद को खेत में मिला, तो यह क्षण पूरे परिवार और गांव के लिए गर्व और भावुकता से भरा था। अभियान दल में उनके साथ दांडू शेरपा, ओम गुरुंग और टीम लीडर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल शामिल थे।

इससे पहले माउंट एवरेस्ट को दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों में से अमेरिका के एरिक वेहेनमायर (2001), ऑस्ट्रिया के एंडी होल्ज़र (2017), चीन के झांग होंग (2021) और अमेरिका के लोनी बेडवेल (2023) फतह कर चुके हैं। लेकिन आंगमो पहली दृष्टिहीन महिला हैं, जिन्होंने यह कारनामा किया है।

छोंजिन आंगमो की दृष्टि कक्षा 3 में पढ़ाई के दौरान दवाइयों की एलर्जी के चलते चली गई थी। परिवार ने इलाज के लिए शिमला, चंडीगढ़ और देहरादून तक की दौड़ लगाई, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद 2005-06 में उन्हें लेह के महाबोधि स्कूल में दाखिला दिलाया गया और उन्होंने दिल्ली के मिरांडा हाउस से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

2016 में मनाली स्थित अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण संस्थान से आंगमो ने अपना पहला बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स किया और फ्रेंडशिप पीक (5,289 मीटर) पर चढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने लद्दाख की कई चोटियों पर चढ़ाई की और 2021 में ऑपरेशन ब्लू फ्रीडम में हिस्सा लिया।

उनकी प्रेरणा स्केलज़ैंग रिग्ज़िन रहे, जिन्होंने उन्हें कांग यात्से-2 (6,250 मीटर) पर चढ़ते देखा और उनके जुनून की सराहना की। एवरेस्ट फतह से पहले उन्होंने माउंट लोबुचे (6,119 मीटर) और फिर कैंप 1 से कैंप 4 तक का अनुकूलन चक्र पूरा किया।

उनकी इस यात्रा में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिसने इस अभियान को प्रायोजित किया। खुद भी बैंक की कर्मचारी आंगमो ने कहा कि यह उनके सपनों को साकार करने में एक निर्णायक कदम रहा।

उनकी चढ़ाई के दौरान रास्ता दिखाने के लिए टीम ने विशेष साइनेज और ट्रेक पोल तकनीक का इस्तेमाल किया, जिससे वह अपने पैर सटीक जगह पर रख सकें। उनके भाई लामा कर्मा येशे, जो बैजनाथ के शेरबलिंग मठ में भिक्षु हैं, इस दौरान लगातार उनकी सफलता के लिए प्रार्थना में लीन रहे।

छोंजिन आंगमो की यह यात्रा सिर्फ एवरेस्ट फतह की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति, साहस और अटूट आत्मविश्वास की मिसाल है। उन्होंने न सिर्फ शारीरिक सीमाओं को चुनौती दी, बल्कि उन लाखों विशेष रूप से सक्षम लोगों के लिए प्रेरणा बन गईं, जो अपने सपनों को सच करने की हिम्मत रखते हैं। उनका अगला लक्ष्य सातों महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों को फतह करना है।

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