शुद्ध उत्पाद, सेहत का ख्याल, ग्रामीण महिलाओं के लिए मिसाल बनी ‘हाटी अम्मा’

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हिमख़बर डेस्क 

बदलती जीवनशैली और खाद्य पदार्थों में बढ़ती मिलावट के बीच हिमाचल प्रदेश में पारंपरिक और प्राकृतिक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।

प्रदेश के विभिन्न जिलों में किसान, स्वयं सहायता समूह और महिला उद्यमी स्थानीय संसाधनों पर आधारित शुद्ध उत्पाद तैयार कर उन्हें बाजार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

इन पहलों से न केवल पारंपरिक खेती और स्थानीय उत्पादों को नई पहचान मिल रही है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को रोजगार और किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य भी प्राप्त हो रहा है।

देशी घी, पारंपरिक अचार, स्थानीय दालें, मसाले, शहद, राजमा और अन्य प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढऩे से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे प्रयासों को उचित बाजार और प्रोत्साहन मिले, तो हिमाचल के स्थानीय उत्पाद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं, साथ ही गांवों में स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा।

प्रदेश में इस पहल की शुरुआत हाटी अम्मा उर्फ सुरेंद्रा तोमर ने की, जो वर्षों से पारंपरिक बिलोना विधि से पहाड़ी और बद्री नस्ल की गाय के दूध से देशी घी तैयार करती रही हैं।

उनका मानना है कि शुद्ध भोजन केवल स्वाद का नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य का भी आधार है। बाजार में बढ़ती मिलावट और रसायनिक उत्पादों के इस्तेमाल को देखते हुए उन्होंने ग्रामीण स्तर पर तैयार होने वाले प्राकृतिक उत्पादों को सीधे लोगों तक पहुंचाने का प्रयास शुरू किया।

सिरमौर जिला के भुटली गांव से शुरू हुई यह पहल अब आसपास के आठ गांवों तक पहुंच चुकी है। इस अभियान से जुड़ी महिलाएं पारंपरिक तरीकों से शुद्ध देशी घी, मसाले, अचार, प्राकृतिक साबुन और अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं।

इससे न केवल उन्हें घर के पास रोजगार मिला है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता के माध्यम से उत्पादन और पैकेजिंग का कार्य संभाल रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पहल केवल स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलने से खेती के प्रति रुचि बढ़ती है और गांवों से शहरों की ओर पलायन को भी कम करने में मदद मिलती है।

वर्तमान में इस पहल के माध्यम से पहाड़ी गाय का देशी घी, बद्री नस्ल की गाय का ए-2 घी, पारंपरिक अचार, प्राकृतिक साबुन, हिमालयी मसाले, विभिन्न प्रकार की दालें, हिमालयी राजमाह, लाल चावल, कुल्थ और अन्य प्राकृतिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

इन उत्पादों को पारंपरिक विधियों से तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि उनकी गुणवत्ता और प्राकृतिक स्वाद बरकरार रहे।

ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कार्य करने वाले जानकारों का कहना है कि यदि ऐसे प्रयासों को संस्थागत सहयोग और बेहतर बाजार उपलब्ध हो, तो यह मॉडल प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।

इससे स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के साथ-साथ किसानों और महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

बिलोना विधि से तैयार

सोलन में अपने बेटे के पास घूमने आई सुरेंद्रा तोमर ने बताया कि आज के समय में लोग पारंपरिक और शुद्ध उत्पादों को अधिक पसंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि खासकर बिलोना विधि से बना देशी घी, घर के बने अचार और प्राकृतिक मसालों की मांग लगातार बढ़ रही है।

लोगों का भरोसा अब ऐसे उत्पादों पर बढ़ा है, जो बिना मिलावट और पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए लोग ऑर्गेनिक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।

मजबूत हुई आर्थिकी

सिरमौर जिला के भुटली गांव से शुरू हुई यह पहल अब आसपास के आठ गांवों तक पहुंच चुकी है। इस अभियान से जुड़ी महिलाएं पारंपरिक तरीकों से देशी घी, मसाले, अचार, प्राकृतिक साबुन और अन्य उत्पाद तैयार कर रही हैं।

इससे न केवल उन्हें घर के पास रोजगार मिला है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता के माध्यम से उत्पादन और पैकेजिंग का कार्य संभाल रही हैं।

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