नहीं सुनाई देगी “बाज” की टाप, साथी के निधन पर पवन व चेतक गमगीन

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सिरमौर – नरेश कुमार राधे

हिमाचल प्रदेश की सिरमौर पुलिस के अश्व दल के सदस्य “बाज” ने लंबी बीमारी के बाद दम तोड़ दिया है। लिहाजा अब शहर की सड़कों पर “बाज” के टाप की आवाज नहीं सुनाई देगी। जुड्डा का जोहड़ स्थित पुलिस के अस्तबल में “बाज” की रविवार सुबह 8 बजे के आस-पास मृत्यु हो गई। तीन घोड़ों के दल में “बाज” की एक अपनी अलग ही पहचान थी।

हालांकि सिरमौर पुलिस के दल से जुड़े कर्मियों में भी “बाज” की मृत्यु से शोक की लहर है, लेकिन “बाज” के दो साथी चेतक व पवन भी गमगीन है। दोपहर को “बाज” के शव का पशु औषधालय में पोस्टमार्टम करवाया गया। इसके पश्चात सिरमौर पुलिस ने पूरे सम्मान के साथ “बाज” की अंत्येष्टि की।

गौरतलब है कि “बाज” 5 मई 2020 से अन्य दो घोड़ों के साथ सिरमौर पुलिस में तैनात था। मिली जानकारी के मुताबिक “बाज” का जन्म 20 फरवरी 2003 को हुआ था। 13 मार्च 2007 को “बाज “को हिमाचल प्रदेश पुलिस में सम्मिलित किया गया था। सिरमौर के अलावा “बाज” ने अपनी शिमला में भी सेवाएं प्रदान की थी।

जानकारों का कहना है कि अमूमन घोड़ों की उम्र 20 से 25 साल के बीच होती है। “बाज” ने अपनी उम्र को पूरा करने के बाद ही संसार को त्याग दिया है।

आपको बता दें कि कुछ अरसे पहले घोड़ों के तीन दल में से बाज को शिमला शिफ्ट कर दिया गया था, लेकिन वियोग के कारण बाज को वापस नाहन लाना पड़ा था। क्योंकि वह अपने दो अन्य साथियों चेतक व पवन से बिछड़ने पर अस्वस्थ रहने लगा था।

जानकारी के अनुसार घोड़ा करीब 4 महीने से अस्वस्थ चल रहा था। हालांकि पशु चिकित्सालय में तैनात सर्जन द्वारा उसे उपचार दिया जा रहा था, लेकिन बात नहीं बन रही थी। पोस्टमार्टम के बाद “बाज” को जुड्डा का जोहड़ में ही दफना दिया गया।

खास मौके के अवसर पर जब शहर की सड़कों पर तीन शानदार घोड़े निकलते थे तो हर कोई इन्हें टकटकी निगाह से देखने लगता था। तीनों जुड्डा के जोहड़ से करीब 5 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद शहर में पहुंचते थे।

करीब-करीब 8-10 साल बाद दिसंबर 2018 में सिरमौर पुलिस को तीन घोड़े मिले थे। इन्हें पुलिस के अश्वरोही दल में शामिल किया गया था। लेकिन वापिस इन्हे शिमला भेज दिया गया था। लंबी जद्दोजहद के बाद इन्हे दोबारा सिरमौर पुलिस के अश्व दल में शामिल किया गया।

बता दें कि सिरमौर रियासत के वक्त में भी गश्त के लिए घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता था। इनके कई फायदे हैं। संकीर्ण गलियों में भी जा सकते हैं तो अपनी टाप से चोरों को खौफजद भी कर सकते हैं।

सिरमौर रियासत के वक्त में चौगान मैदान के समीप अस्तबल भी था। 60 के दशक के बाद इसमें आर्ट्स कॉलेज शुरू किया गया। अब यह परिसर मेडिकल कॉलेज के सुर्पुद किया जा चुका है।

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