पालमपुर – बर्फू
स्वतंत्रता दिवस पर देश उन वीरों को याद कर रहा है, जिनके बलिदान की बदौलत देश की आजादी और अखंडता सुरक्षित है। पालमपुर क्षेत्र सैन्य शौर्य की ऐसी गौरवशाली परंपरा का गवाह है, जिसने देश को परमवीर चक्र और अशोक चक्र जैसे सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों से सम्मानित योद्धा दिए। मेजर सोमनाथ शर्मा, कैप्टन विक्रम बत्रा, मेजर सुधीर कुमार वालिया और कैप्टन सौरभ कालिया सहित क्षेत्र के अनेक शहीदों की वीरगाथाएं आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं।
मेजर सोमनाथ शर्मा-देश के पहले परमवीर
31 जनवरी, 1923 को पालमपुर के करीब डाढ़ में जन्मे मेजर सोमनाथ शर्मा भारतीय सेना के पहले परमवीर चक्र विजेता बने। 3 नवंबर, 1947 को श्रीनगर के निकट बडग़ाम की लड़ाई में उन्होंने दुश्मन के भारी हमले के बीच अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए अदम्य साहस दिखाया और वीरगति प्राप्त की। उनके बलिदान ने श्रीनगर हवाई अड्डे को सुरक्षित रखने और कश्मीर की रक्षा में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कैप्टन विक्रम बत्रा-‘शेरशाह’ की अमर गाथा
पालमपुर की धरती के वीर सपूतों में कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम अग्रणी है। 1999 के कारगिल युद्ध में 13 जम्मू-कश्मीर रायफल्स के अधिकारी कैप्टन बत्रा ने प्वाइंट 5140 और बाद में प्वाइंट 4875 पर अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। सात जुलाई, 1999 को प्वाइंट 4875 पर साथियों को बचाते हुए वे शहीद हो गए। उनकी असाधारण वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।
मेजर सुधीर वालिया-अशोक चक्र से अमर नाम
पालमपुर के बनूरी से संबंध रखने वाले मेजर सुधीर कुमार वालिया भारतीय सेना की विशिष्ट पैरा स्पेशल फोर्सेज इकाई में रहे। उन्होंने कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों से लेकर कारगिल युद्ध तक अदम्य साहस का परिचय दिया। 29 अगस्त, 1999 को कुपवाड़ा के हफरूदां क्षेत्र में अभियान के दौरान वे शहीद हुए। उनके सर्वोच्च बलिदान और असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत ष्षांतिकाल के सर्वोच्च सैन्य सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
कैप्टन सौरभ कालिया-कारगिल के पहले शहीद
कारगिल युद्ध की शुरुआती भयावहता की जानकारी देश तक पहुंचाने वाले वीर अधिकारी कैप्टन सौरभ कालिया का नाम भी पालमपुर से जुड़ा है। वह 4 जाट रेजिमेंट के अधिकारी थे और मई, 1999 में कारगिल क्षेत्र में गश्त के दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों के हाथ लगे। बाद में उनका शव भारत को सौंपा गया। उन्हें कारगिल युद्ध का पहला शहीद कहा जाता है। पालमपुर में उनके नाम पर मार्ग और स्मृति स्थल आज भी उनकी शहादत की याद दिलाते हैं।

