किन्नौर की सांगला घाटी में यारपाबंग झील के बढ़ते आकार ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। झील के लगातार फैलाव को देखते हुए संभावित खतरे को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है।
हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर की सांगला घाटी में देबार कंडे के ऊंचाई वाले क्षेत्र में स्थित यारपाबंग झील के आकार और जलस्तर में निरंतर वृद्धि से स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है। उनका मानना है कि झील का बढ़ता जलस्तर और आसपास के ग्लेशियरों के पिघलने के कारण भविष्य में गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ से उत्पन्न त्रासदी ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक और तकनीकी उपाय नहीं किए तो सांगला घाटी के निचले क्षेत्रों में संभावित आपदा का सामना करना पड़ सकता है। पंचायत सांगला के प्रधान एडवोकेट प्रविंद्र नेगी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त किन्नौर डा. अमित कुमार शर्मा को ज्ञापन सौंपा है।
ज्ञापन में झील की वर्तमान स्थिति का वैज्ञानिक आकलन, जलस्तर की नियमित निगरानी, संभावित खतरे का पुनर्मूल्यांकन और अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की मांग की गई है। पंचायत ने सुझाव दिया है कि यारपाबंग झील और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वे और सेंसर आधारित निगरानी की स्थायी व्यवस्था की जाए, ताकि आपात स्थिति में लोगों को समय पर अलर्ट किया जा सके।
वर्ष 2024 में एक संयुक्त वैज्ञानिक और तकनीकी टीम ने झील का निरीक्षण किया था, जिसमें झील की लंबाई 550 मीटर, चौड़ाई 260 मीटर और गहराई 28 मीटर पाई गई थी। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियर से जुड़ी झीलों का खतरा केवल उनके आकार से नहीं, बल्कि जलस्तर, जल आयतन, प्राकृतिक बांध की मजबूती, हिमस्खलन और चट्टान गिरने की संभावनाओं से भी निर्धारित होता है।
स्थानीय पंचायत के अनुसार, आपात स्थिति में झील का पानी बास्पा नदी की ओर तेजी से बढ़ने पर सांगला से कड़छम तक लगभग 18 किलोमीटर का क्षेत्र तबाह हो सकता है। इससे हुरबा, केदारचो, छिदोसारिंग, चांगसारिंग, रूतरंग, जारयो सारिंग, शौंग, कुप्पा और ब्रुआ जैसे निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। क्षेत्र में 300 मेगावाट बास्पा-दो और 1000 मेगावाट कड़छम-वांगतू जैसी महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाएं भी हैं।
क्या कहना है उपायुक्त का
उपायुक्त डा. अमित कुमार ने बताया कि झील की सुरक्षा से संबंधित रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और सुरक्षा उपायों के लिए लगभग एक करोड़ रुपये की मंजूरी मिल चुकी है। स्थानीय निवासी एवं पर्यावरण प्रेमी पदम हंस रेपाल्टों ने झील का दौरा करने के बाद भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के पिघलने और भूकंप जैसी परिस्थितियों के कारण किसी भी संभावित खतरे को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

