बिना NEET भी मेडिकल फील्ड में बनाएं शानदार करियर, 12वीं के बाद इन कोर्सेज से खुलेंगे रोजगार के रास्ते

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NEET के बिना भी हेल्थकेयर सेक्टर में कई करियर विकल्प मौजूद हैं, जिनमें फार्मेसी, फिजियोथेरेपी, मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी, रेडियोलॉजी, ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी और अन्य पैरामेडिकल कोर्स शामिल हैं। हालांकि MBBS जैसे कोर्स के लिए NEET जरूरी है।

शाहपुर – नितिश पठानियां

12वीं के बाद मेडिकल की फील्ड में जाना हर स्टूडेंट्स का सपना होता है। अधिकतर छात्र सोचते हैं कि डॉक्टरी या मेडिकल की लाइन में आगे बढऩे के लिए नीट एग्जाम जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं है। साइंस के स्टूडेंट्स बिना नीट एंट्रेंस पास किए भी कई कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं। यह कोर्स उन्हें सुनहरे भविष्य का मौका देते हैं।

खास बात यह है कि इस फील्ड में कैंडीडेट सिर्फ नौकरी ही नहीं, बल्कि बिजनेस भी कर सकते हैं। साइंस स्ट्रीम में पढ़ाई करने वाले छात्र अगर मेडिकल फील्ड की मुख्य स्ट्रीम में जाने की चाह रखते हैं, तो जाहिर सी बात हैं नीट क्वालीफाई करने के बाद ही इस कोर्स में दाखिला ले सकते हैं, लेकिन इससे हटकर बिना नीट एंट्रेंस एग्जाम पास किए भी मेडिकल फील्ड में करियर बना सकते हैं।

चिकित्सा क्षेत्र में ऐसे कई कोर्स हैं, जिन्हें करके इसमें करियर बनाने के सपने को पूरा किया जा सकता है। इन डिग्री कोर्स का समय तीन से पांच साल है। कोर्स को पूरा करने के बाद कैंडीडेट मेडिकल फील्ड में ऊंचाइयों पर जा सकते हैं।

बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, स्पोट्र्स इंजरी और लाइफस्टाइल की वजह से फिजियोथेरेपिस्ट की डिमांड आसमान छू रही है। फिजियोथेरपिस्ट की पढ़ाई भी कैंडीडेट को बिना नीट किए मेडिकल कोर्स करने के विकल्प देती है। इसमें साइंस स्टूडेंट्स 12वीं पास के बाद बैचलर ऑफ़ फिजियोथेरपिस्ट कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।

इसमें डायरेक्ट और एंट्रेंस दोनों तरह से दाखिला लिया जा सकता है । यह कैंडीडेट की पसंद पर निर्भर करता है। इसमें बिजली यांत्रिक, एक्ससरसाइज की ट्रिक्स, एनर्जी और यांत्रिक उपकरणों की मदद से रोगी के इलाज करने की पढ़ाई कराई जाती है।

कोर्स की अवधि: 4.5 साल (इसमें 6 महीने की इंटर्नशिप शामिल है)।

इनका काम : फिजियोथेरेपिस्ट बिना दवाओं और सर्जरी के, सिर्फ एक्सरसाइज और थेरेपी के जरिए मरीजों के दर्द और हड्डियों की दिक्कतों को ठीक करते हैं।

कमाई और स्कोप: कोर्स पूरा करने के बाद कैंडीडेट फिटनेस क्लीनिक, विशेष ट्रेनिंग स्कूल और मल्टीनेशनल कंपनी हॉस्पिटल में , सरकारी और निजी विभाग में एक फिजियो थेरेपिस्ट के तौर पर नियुक्त हो सकते हैं। यह क्षेत्र बिजनेस का मौका भी देता है। कोर्स के बाद आप खुद का क्लीनिक खोल सकते हैं। शुरुआत में तीन से पांच लाख रुपए सालाना का पैकेज आसानी से मिल जाता है, जो अनुभव के साथ आठ से 10 लाख रुपए तक पहुंच जाता है।

बैचलर ऑफ फार्मेसी

फॉर्मेसी का पेशा चिकित्सा यानी मेडिकल फील्ड से जुड़ा हुआ है, जो लोग बिना नीट एग्जाम पास किए मेडिकल में जाने की चाह रखते हैं, वे बैचलर इन फार्मेसी का कोर्स कर सकते हैं। इसे बी फार्मा के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कैंडीडेट को मेडिकल केमिस्ट्री, औद्योगिक फॉर्मेसी, ड्रग सेफ्टी आदि विषयों की पढ़ाई कराई जाती है। दवाइयों की दुनिया हमेशा डिमांड में रहती है। कोरोना महामारी के बाद से फार्मा सेक्टर में नौकरियों की बाढ़ आई हुई है।

कोर्स अवधि: इस कोर्स की डिग्री तीन साल है।

इनका काम : इसमें दवाइयों के निर्माण, टेस्टिंग और उनके असर के बारे में पढ़ाया जाता है।

कमाई और स्कोप: कोर्स को पूरा करने के बाद कैंडीडेट सरकारी और प्राइवेट दोनों ही सेक्टर में करियर बना सकते हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद कैंडीडेट को ड्रग टेक्निशयन, केमिकल टेक्नीशियन, हैल्थ इंस्पेक्टर, फार्मेसिस्ट आदि की प्रोफाइल मिलती है। किसी बड़ी फार्मा कंपनी में रिसर्च एंड डिवेलपमेंट में जा सकते हैं या अपना खुद का मेडिकल बिजनेस शुरू कर सकते हैं। शुरुआती सैलरी तीन से 4.5 लाख रुपए सालाना होती है।

बैचलर ऑफ वेटरिनरी साइंस

एनिमल साइंस को वेटरिनरी साइंस भी कहते हैं। यह फील्ड पशु चिकित्सा से संबंधित डाइग्नोसिस और रोगों के उपचार से संबंधित है। 12वीं के बाद इस कोर्स में दाखिला लिया जा सकता है। इसमें बैचलर ऑफ वेटरिनरी साइंस की डिग्री हासिल की जा सकती है।

कोर्स की अवधि: इस कोर्स की डिग्री 5.5 साल है।

कोर्स खत्म करने के अंतिम छह महीने में एनिमल साइंस में इंटर्नशिप की जा सकती है, जिसमें पशु चिकित्सा की जानकारी दी जाती है।

कमाई और स्कोप: कोर्स पूरा करने के बाद कैंडीडेट एनिमल सर्जन, वेटरिनरी मेडिकल असिस्टेंट, वेटेनरी फार्माकोलॉजिस्ट आदि प्रोफाइल पर काम कर सकते हैं। इसमें अच्छी सैलरी और अच्छा प्रोमोशन भी मिलता है।

बीएससी इन रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग टेक्नोलॉजी

हॉस्पिटल में जब भी कोई मरीज जाता है, तो डॉक्टर सबसे पहले एक्स-रे, सीटी स्कैन या एमआरआई कराने को कहते हैं। यहीं पर काम आता है एक रेडियोलॉजिस्ट।

कोर्स की अवधि: इस कोर्स की डिग्री तीन साल है।

इनका काम: स्टूडेंट्स को एडवांस मेडिकल इमेजिंग मशीनें (जैसे एमआरआई, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड) ऑपरेट करना सिखाया जाता है.

कमाई और स्कोप: अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटर्स में इन प्रोफेशंस की भारी कमी है, इसलिए यहां जॉब सिक्योरिटी 100 फीसदी है। शुरुआती सैलरी चार से छह लाख रुपए सालाना तक हो सकती है।

बीएससी इन मेडिकल लेबोरेटरी टेक्नोलॉजी

बीमारी का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट या यूरिन टेस्ट सबसे जरूरी होता है। लैब टेक्नोलॉजी के बिना मेडिकल साइंस अधूरा है।

कोर्स की अवधि: इस कोर्स की डिग्री तीन साल है।

इनका काम : इसमें तरह-तरह के मेडिकल टेस्ट करना और बीमारियों की जांच करना सिखाया जाता है।

कमाई और स्कोप: आप अपनी खुद की पैथोलॉजी लैब खोल सकते हैं या बड़े अस्पतालों की लैब्स के हैड बन सकते हैं। इसमें शुरुआती पैकेज तीन से पांच लाख रुपए सालाना तक रहता है।

बीएससी नर्सिंग

हैल्थकेयर सिस्टम की रीढ़ की हड्डी नर्स ही होती हैं। डॉक्टरों के बाद मरीजों की देखभाल का पूरा जिम्मा इन्हीं पर होता है।

कोर्स की अवधि: इस कोर्स की डिग्री चार साल है।

इनका काम : मरीजों की क्रिटिकल केयर, दवाइयों का मैनेजमेंट और डॉक्टरों की मदद करना।

कमाई और स्कोप: भारत के साथ-साथ विदेशों (जैसे यूके, कनाडा, गल्फ देश) में भारतीय नर्सों की भारी डिमांड है। भारत में शुरुआती सैलरी तीन से चार लाख रुपए सालाना होती है, लेकिन सरकारी नौकरी या विदेश जाने पर यह पैकेज 10 से 15 लाख रुपए सालाना से भी ज्यादा हो सकता है।

बैचलर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी

यह एक नया फील्ड है। नया होने के बावजूद कैंडीडेट को इसमें करियर के अच्छे विकल्प मिल सकते हैं। इस कोर्स में कैंडीडेट बैचलर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी की डिग्री हासिल कर सकते हैं। इस कोर्स की डिग्री 4.5 साल है। कोर्स पूरा करने के बाद कैंडीडेट एनजीओ और निजी हॉस्पिटल या फिर सरकारी हॉस्पिटल में जॉब कर सकते हैं। इस कोर्स के अंतर्गत कैंडीडेट व्यायाम, कार्यात्मक प्रशिक्षण आदि का काम करते हैं।

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