
बिलासपुर, सुभाष चंदेल
जिला कांग्रेस महासचिव में कहा कि इस कोरोना काल मे आशा वर्करों ने जितना काम किया है उसकी बनिस्पत उनको मानदेय या सेलरी नहीं मिल पा रही है। जिसके लिए प्रदेश सरकार को गम्भीरता से सोचना चाहिए। अगर गौर किया जाए तो आशा वर्कर गर्भवती महिला की जांच से लेकर शिशु की सुरक्षा और उनको लगने वाले हर टिके की खुराक तक कि जिम्मेदारी को निभाती है।
इसके अलावा जब भी समाज मे कोई महामारी आती है तो सबसे ज्यादा ग्राउंड वर्किंग आशा वर्कर की करती है। वही उस महामारी के खिलाफ सबसे ज्यादा लड़ती है लेकिन पगार के नाम और एक आशा वर्कर को महीने के केवल 2000 रुपये मिलते हैं जबकि फील्ड में सबसे ज्यादा वर्किंग आशा वर्कर ही करती है। किसी भी सामाजिक जागरूकता अभियान से लेकर लोंगो को घर द्वार दवाएं पहुंचाने तक का काम आशा वर्कर के जिम्मे ही होता है।
अभी कोविड 19 पेंडेमिक महामारी के चलते चाहे लोंगो को जागरूक करने की बात हो या फिर गांवों में कोरोना पीड़ितों को दवाई देनी हो या फिर उनकी बीमारी के प्रति कोई संदेश मरीज को पहुंचाना हो या फिर मरीज की तबियत के बारे में चिकिसकों या प्रशासन को जानकारी देनी हो, सारी जिम्मेदारी आशा वर्करों ने बखूबी निभाई है।
कोविड 19 में कोरोना पोसिटिव मरीजों को दवाओं से लेकर इनको इसोलेशन की व्यवस्था को देखना और उनकी खाने की व्यवस्था को देखना कि मरीज को उसके तीमारदार ठीक से इसोलेशन में रख रहे है उक्त मरीज को खाना ठीक से मिल रहा है सारी व्यवस्थाएं आशा वर्करों के ही सहारे है। अगर इनको मिलने वाली पगार या मानदेय ओर नजर दौड़ाई जाए तो इनकी स्थिति बड़ी असहनीय नज़र आती है।
जब इन आशा वर्करों की नियुक्तियां की गई थी तब इनको 850 रुपये प्रतिमाह एक वर्ष तक मिलता रहा, उसके उपरांत इनको 1000 प्रतिमाह दिया जाने लगा, फिर करीब एक वर्ष के बाद इनको 1500 रुपये प्रति माह दिए गए फिर कुछ वर्षों के बाद इनको 1800 रुपये प्रति माह और अब कोरोना काल महामारी के दौरान इनको 2000 रुपये प्रति माह दिए जा रहे हैं।
जबकि एक गर्भवती महिला के देख रेख के बाद जब बच्चे का जन्म होता है तो प्रति डिलीवरी केस का 300 रुपये और बच्चे को मीज़ल देने के 9 माह बाद केवल 100 रुपये, डेड वर्ष बर्फ 75 रुपये दिए जाते हैं इसके उपरांत इनके कार्यक्षेत्र के बच्चों को टीकाकरण करवाने का केवल 100 ही रुपया मिलता है। आशा वर्करों को वर्दी के लिए 300-300 रुपये साल में दो बार मिलता है।
अगर औसतन इनकी प्रति माह पगार की गणना की जाए वह करीब 2100 या 2150 रुपये प्रतिमाह ही पड़ती है, जो कि आशा वर्करों के काम को देखते हुए बहुत ही कम है और ऊपर से भविष्य में इनके काम को देखते हुए इनकी नौकरी में प्रगति हेतु कोई अधिक संभावनाएं नज़र नही आती है।
प्रदेश सरकार को इनके बारे में सोचना चाहिए इनको 84 दिन के फोन रिचार्ज से लेकर इनको मिनले वाली पगार या मानदेय और भविष्य में इनके जीवन यापन हेतू कोई कारगर नीति लाई जानी चाहिए ताकि समाज मे इनकी सेवाओं का बोझ उतारा जा सके और इनको एक सम्मानजनक वेतन मिल सके।
आदर सहित
संदीप सांख्यान
महासचिव, जिला कांग्रेस
बिलासपुर (हि.प्र)
