हिमखबर डेस्क
सिरमौर की धरती ने देश की रक्षा के लिए न जाने कितने वीर सपूतों को जन्म दिया है। इसी वीरभूमि के एक ऐसे योद्धा थे सिपाही मंशाराम, जिनका नाम सैनिक कल्याण बोर्ड की सूची में सिरमौर के दूसरे शहीद के रूप में दर्ज है।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में देश की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी शहादत को छह दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उनके गांव और परिवार के लिए वह बलिदान आज भी उतना ही जीवंत है।
नाहन विकासखंड के कौनथ्रो गांव में पिता रुलिया राम और माता कांटो देवी के घर जन्मे मंशाराम चार भाइयों में से एक थे। परिवार साधारण था और खेती-बाड़ी ही जीवन का मुख्य सहारा थी।
बचपन से ही उन्होंने संघर्ष को करीब से देखा, लेकिन मुश्किलों ने उनके हौसले कभी कमजोर नहीं किए। मेहनत और देश सेवा के जज्बे ने उन्हें सेना तक पहुंचाया। जब उन्होंने राजपूत रेजिमेंट की वर्दी पहनी तो परिवार और पूरे गांव के लिए वह गर्व का पल था।
सेना में रहते हुए मंशाराम ने अनुशासन और कर्तव्य को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। इसी बीच उनका विवाह शांति देवी से हुआ। परिवार में नई खुशियां आईं, लेकिन शादी के महज दो-तीन महीने बाद ही देश पर युद्ध का संकट मंडराने लगा। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्हें भी सीमा पर मोर्चे पर जाना पड़ा।
युद्ध के दौरान दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच सिपाही मंशाराम ने अदम्य साहस का परिचय दिया। गोलियों और बारूद के बीच वह अपने साथियों के साथ डटे रहे। 31 अक्टूबर 1962 को देश की रक्षा करते हुए उन्हें गोली लगी और वह वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय उनका वैवाहिक जीवन अभी शुरू ही हुआ था, लेकिन उन्होंने अपने निजी सुख से ऊपर देश की रक्षा को रखा।
शहादत की खबर जब गांव पहुंची तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उस दौर में आज की तरह शहीदों के पार्थिव शरीर घर तक नहीं पहुंचते थे। सेना की चिट्ठी के जरिए परिवार को बेटे की शहादत की सूचना मिली। कुछ समय बाद जब सेना के जवान उनका सामान लेकर गांव पहुंचे तो माता-पिता के सामने बेटे की यादों से जुड़ी वस्तुएं थीं, लेकिन उनका बेटा नहीं था।
मंशाराम की कहानी केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि त्याग, साहस और देशभक्ति की ऐसी मिसाल है जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाना चाहिए। कौनथ्रो की धरती आज भी अपने इस वीर सपूत की शहादत पर गर्व करती है। सिपाही मंशाराम को शत-शत नमन। उनका बलिदान हमेशा देश और सिरमौर की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।

