औषधीय कंद मूल किसी संजीवनी से कम नही किस कंद मूल की बात कर रहे हैं हम जानने के लिए पढ़े पूरी कहानी ।

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रैत: अँशुल दीक्षित

हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के धारकंडी क्षेत्रों मे ठंड के मौसम में तरड़ी नामक जंगली कंद पाया जाता है। इसे मिट्टी से निकालना काफी मेहनत का काम है। इसलिए आजकल यह कंद लोगों की पहुँच से दूर हो चुका है लगभग । यह जड़नूमा कंद हिमाचल के कुछ बाजारों में बहुत थोड़ी मात्रा में बिकने को पहुंचता है।

क्या है इसको खाने के फायदे।

तरड़ी कंन्द अति स्वादिष्ट होने के साथ अति बलवर्धक व सेहत के लिए बहुत ही गुणकारी होता है। यह कंन्द जंगल में पैदा होता है, वहीं खेती के रूप में भी उगाया जा सकता है। ये एक पौधा ना होकर बेलनुमा होते हैं तथा इस बेल के नीचे कंन्द के रूप में तरड़ी नामक कंन्द पाया जाता है।

भगवान शिव को है अतिप्रिय —–शिवरात्रि पर विशेष रूप से लगता हैं इसका भोग 

इस कन्द का पौराणिक कथाओं में भी वर्णन मिलता है। इस कंन्द का सम्बन्ध महादेव शिव की शिवरात्रि से माना जाता है। कहा जाता है कि यह कन्द भगवान शिव के प्रिय फलाहारों में आता है। तथा शिवरात्रि के समय खुद व खुद जमीन से ऊपर आ जाता है। आयुर्वेद में भी इस कंन्द की महिमा का वर्णन है। इस कंन्द में कई औषधीय गुण मौजूद होते है, जिस कारण इस कंन्द का औषधीय महत्व भी बहुत ज्यादा है।

इस कंन्द में बहुत ज्यादा मात्रा में जरुरी तत्वों के अलावा, बिटामिन बी ग्रुप व फोस्फेट्स कैल्शियम, जिंक आयरन व क्रोमियम पाया जाता है। यह कुदरती आहार मानव शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। अभी तक हिमाचल प्रदेश में इसे वाणिज्यिक फसल का दर्जा हासिल नहीं हुआ है।

प्रदेश में व्यवसायिक स्तर पर अभी तक कहीं भी तरड़ी की खेती की पहल नहीं हुई है। तरड़ी के औषधीय गुणों को देखते हुए बाजार में इसकी भारी मांग होने के कारण अगर व्यर्थ जमीन पर सही तरीके से इसकी खेती की जाए तो किसान के लिए मेंड़ों या बेकार जमीन से आमदन के साधन बढ़ सकते हैं। पहाड़ के किसान तरड़ी की खेती कर अपनी आर्थिकी स्थिति काफी मज़बूत कर सकते हैं । सरकार को इस तरफ भी नज़र घुमानी चाहिए।

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