हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश में इंदिरा गांधी चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (आइजीएमसी) शिमला में चिकित्सा जगत का बेहद दुर्लभ मामला सामने आया है। यहां गर्भ में पल रहे एक भ्रूण के मुंह के भीतर दूसरा भ्रूण मिला। चिकित्सकीय भाषा में इस स्थिति को फीटस इन फीटू कहा जाता है।
खास बात यह है कि इस मामले की पहचान बच्चे के जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान ही अल्ट्रासाउंड जांच में कर ली गई। इस दुर्लभ मामले की केस रिपोर्ट हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है।
जानकारी के अनुसार 20 वर्षीय महिला की गर्भावस्था के 22वें सप्ताह से पहले सोनोग्राफी की गई। जांच के दौरान गर्भ में पल रहे भ्रूण के जबड़े में असामान्यता दिखाई दी। साथ ही उसके मुंह के भीतर एक अलग तरह की संरचना भी नजर आई।
मामला सामान्य नहीं लगने पर चिकित्सकों ने अल्ट्रासाउंड समेत अन्य इमेजिंग तकनीकों से इसकी विस्तृत जांच की। जांच के बाद सामने आया कि मुंह के भीतर दिखाई दे रही संरचना फीटस इन फीटू थी। चिकित्सकों के अनुसार फीटस इन फीटू बेहद दुर्लभ स्थिति है।
जुड़वा गर्भावस्था के दौरान किसी कारण एक भ्रूण का सामान्य विकास नहीं हो पाता और वह दूसरे विकसित हो रहे भ्रूण के शरीर के भीतर रह जाता है। आमतौर पर ऐसे मामले पेट या शरीर के अन्य हिस्सों में पाए जाते हैं। लेकिन आइजीएमसी में सामने आया मामला इसलिए और भी असामान्य था, क्योंकि परजीवी भ्रूण का हिस्सा मुंह के निचले हिस्से की ओर दिखाई दे रहा था।
इसके साथ ही भ्रूण के जबड़े में भी गंभीर दोष पाया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक फीटस इन फीटू के अधिकांश मामलों का पता बच्चे के जन्म के बाद चलता है। गर्भ में रहते हुए अल्ट्रासाउंड से इसकी पहचान होना ही दुर्लभ है। वहीं, गर्भ में पल रहे भ्रूण के मुंह के भीतर दूसरे भ्रूण की मौजूदगी को बेहद असामान्य स्थिति माना जाता है।
इस मामले में आइजीएमसी के स्त्री एवं प्रसूति रोग और रेडियोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने विभिन्न इमेजिंग तकनीकों की मदद से समय रहते इसकी पहचान की। जांच में भ्रूण में गंभीर असामान्यताएं सामने आने के बाद चिकित्सकों ने स्वजन को स्थिति की जानकारी दी।
गर्भावस्था 22 सप्ताह से कम होने और भ्रूण में गंभीर विकृतियां पाए जाने के कारण चिकित्सकीय परामर्श और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत गर्भावस्था को समाप्त किया गया।
चिकित्सकों के अनुसार समय रहते स्थिति की पहचान होने से महिला के स्वास्थ्य और जीवन पर संभावित खतरे को कम करने में मदद मिली। अंतरराष्ट्रीय जर्नल में केस रिपोर्ट प्रकाशित होने से आइजीएमसी के विशेषज्ञों के इस दुर्लभ चिकित्सकीय अनुभव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है।

