हिमखबर डेस्क
सिरमौर की धरती ने हमेशा वीरों को जन्म दिया है। राजगढ़ तहसील का शिवपुर/हाब्बन गांव भी उसी वीर परंपरा की एक ऐसी कहानी अपने सीने में समेटे हुए है, जिसे याद करते ही आंखें नम और सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
यह कहानी है लांस नायक भीम बहादुर उर्फ भीम सिंह ठाकुर की एक ऐसे वीर सपूत की, जिसके जीवन में खुशियों के कई रंग अभी बाकी थे, लेकिन मां भारती की पुकार ने उन्हें सब कुछ छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए लौटने पर मजबूर कर दिया।
5 अगस्त 1975 को पिता बिजली प्रसाद और माता रामकली ठाकुर के घर जन्मे भीम सिंह ने बचपन से ही संघर्षों को करीब से देखा।
परिवार खेती-बाड़ी से जुड़ा था और पहाड़ की कठिन जिंदगी उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। मगर अभाव उनके हौसले को कभी नहीं तोड़ सके।
पढ़ाई के साथ खेलों में उनकी विशेष रुचि थी। फागू स्कूल में दसवीं की पढ़ाई के दौरान वॉलीबॉल में उनकी प्रतिभा निखरी और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई।
दसवीं के बाद उनके जीवन का वह सपना पूरा हुआ, जिसका इंतजार परिवार और गांव को था। भीम सिंह भारतीय सेना की 2/9 जीआर में भर्ती हुए।
बेटे के शरीर पर सेना की वर्दी देखकर पिता की आंखों में गर्व के आंसू थे और हाब्बन गांव में खुशी का माहौल था। सेना में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा और जज्बे से अलग पहचान बनाई।
कठिन कमांडो कोर्स पूरा किया। बास्केटबॉल और फुटबॉल में भारत का प्रतिनिधित्व किया और श्रीलंका में आयोजित राइफल शूटिंग प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल कर अपनी अचूक निशानेबाजी का परिचय दिया।
इतनी उपलब्धियों के बावजूद भीम सिंह का स्वभाव बेहद सरल और मिलनसार रहा। फिर आया 11 जून 2000 का वह दिन, जिसने परिवार की खुशियों को हमेशा के लिए मातम में बदल दिया।
भीम सिंह छुट्टी पर घर आए हुए थे। इसी बीच सीमा पर तनावपूर्ण हालात के चलते उन्हें तत्काल ड्यूटी पर लौटने का आदेश मिला।
परिवार चाहता था कि बेटा कुछ दिन और घर में रहे, लेकिन भीम सिंह के लिए देश सबसे पहले था। छुट्टियां अधूरी रह गईं और वह वापस ड्यूटी पर लौट गए।
श्रीनगर-लेह मार्ग के खूनी नाला क्षेत्र में हुए आतंकी हमले में भीम सिंह समेत 48 वीर जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। जिस बेटे के सिर पर सेहरा सजने का इंतजार परिवार कर रहा था, उसी बेटे का पार्थिव शरीर कुछ समय बाद तिरंगे में लिपटकर घर लौटा।
सपने अधूरे रह गए, लेकिन देश के प्रति उनका कर्तव्य पूरा हो गया। जब शहीद भीम सिंह का पार्थिव शरीर हाब्बन पहुंचा तो पूरा क्षेत्र गम में डूब गया। जिन गलियों से कभी उनकी बारात गुजरने की उम्मीद थी, वहीं से उनकी अंतिम यात्रा निकली।
लोगों ने नम आंखों से ‘भारत माता की जय’ और ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, भीम सिंह तेरा नाम रहेगा’ के नारों के साथ अपने वीर सपूत को अंतिम विदाई दी।
आज भी शहीद भीम सिंह की याद गांव की मिट्टी में जिंदा है। उनकी स्मृति में शहीद पार्क बनाया गया है और हर वर्ष 11 जून को शहीद दिवस मनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
उनके भाई ओम सिंह बताते हैं कि भीम सिंह का बलिदान आज भी पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा है। भीम सिंह चले गए, लेकिन उनकी कहानी नहीं गई।
अधूरी छुट्टियां, अधूरे सपने और तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर आज भी यही संदेश देता है देश की मिट्टी के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।
सिरमौर की इस वीर माटी के अमर सपूत लांस नायक भीम सिंह ठाकुर को शत-शत नमन।

