पालमपुर-बर्फू
आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर हजारों चेहरों को अपना आदर्श मानती है। लेकिन कुछ ऐसे नायक भी हैं, जिनकी कहानी केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि हर भारतीय के दिल में हमेशा के लिए अंकित है।
ऐसा ही एक नाम है परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा, जिन्हें पूरा देश प्यार से ‘शेरशाह’ के नाम से जानता है।
आज भी जब कारगिल विजय की बात होती है तो एक आवाज हर भारतीय के कानों में गूंजती है-“ये दिल मांगे मोर…”।
यह किसी विज्ञापन का नारा नहीं, बल्कि उस वीर सैनिक का युद्धघोष था जिसने हिमालय की बर्फीली चोटियों पर तिरंगा फहराकर भारत के शौर्य का परचम पूरी दुनिया में लहराया।
पालमपुर से कारगिल तक का सफर ….
9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा बचपन से ही साहसी, अनुशासित और देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे।
उनके पिता जीएल बत्रा विद्यालय के प्राचार्य और माता कमल कांता बत्रा शिक्षिका थीं। पढ़ाई के साथ-साथ खेलों और एनसीसी में उनकी विशेष रुचि थी।
युवावस्था में उन्हें मर्चेंट नेवी में आकर्षक नौकरी का अवसर मिला, जहां उज्ज्वल भविष्य और ऊंचा वेतन उनका इंतजार कर रहा था। लेकिन उन्होंने आरामदायक जीवन के बजाय मातृभूमि की सेवा का मार्ग चुना।
दिसंबर 1997 में भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से प्रशिक्षण पूरा कर वे 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स में कमीशन हुए।
कारगिल की ऊंचाइयों पर लिखा शौर्य का इतिहास
साल 1999 में पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों ने कारगिल की रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया।
यह युद्ध सामान्य नहीं था। लगभग 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर बैठे दुश्मन के खिलाफ भारतीय सैनिकों को खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए लड़ना पड़ रहा था।
इसी दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा को पॉइंट 5140 पर कब्जा करने का दायित्व सौंपा गया। दुश्मन की लगातार गोलीबारी के बीच उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के बंकरों पर सीधा हमला बोला और जीत हासिल की।
जब सेना मुख्यालय ने सफलता की पुष्टि मांगी, तो वायरलेस सेट पर उनकी बुलंद आवाज सुनाई दी—”ये दिल मांगे मोर!” यही चार शब्द पूरे देश के लिए साहस, आत्मविश्वास और विजय का प्रतीक बन गए।
साथी को बचाते हुए दिया सर्वोच्च बलिदान….
पॉइंट 5140 की सफलता के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को पॉइंट 4875 पर कब्जा करने का जिम्मा मिला। यह मिशन पहले से कहीं अधिक कठिन था।
युद्ध के दौरान उनका एक साथी सैनिक गंभीर रूप से घायल होकर दुश्मन की फायरिंग रेंज में फंस गया। स्थिति बेहद जोखिम भरी थी, लेकिन कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने साथी को बचाने का निर्णय लिया।
उन्होंने दुश्मन पर जोरदार हमला बोलते हुए कई घुसपैठियों को मार गिराया, लेकिन इसी दौरान दुश्मन की गोली लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
7 जुलाई 1999 को महज 24 वर्ष की आयु में उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया और अमर हो गए।
परमवीर चक्र से सम्मानित, ‘बत्रा टॉप’ बना अमर स्मारक…..
कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र, देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान, से सम्मानित किया।
जिस पॉइंट 4875 पर उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए, उसे आज भारतीय सेना सम्मानपूर्वक ‘बत्रा टॉप’ के नाम से जानती है।
हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा….
आज उनकी शहादत को 27 वर्ष हो चुके हैं। समय बदल गया, दुनिया बदल गई, लेकिन कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम आज भी हर भारतीय के दिल में उसी गर्व और सम्मान के साथ जीवित है।
जब भी कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है… जब भी कोई युवा सेना की वर्दी पहनने का सपना देखता है… जब भी तिरंगा शान से लहराता है… तब एक आवाज फिर गूंजती है— “ये दिल मांगे मोर…।”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस जज्बे का प्रतीक है, जो सिखाता है कि देशभक्ति शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म और बलिदान से सिद्ध होती है।
हिमख़बर न्यूज नेटवर्क की ओर से परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा को शत-शत नमन।
यही हैं… ‘द प्राइड ऑफ हिमाचल’।

