हिमख़बर डेस्क
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी ठेकेदार के अधीन काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों को नया ठेका मिलने पर दूसरे ठेकेदार के पास नौकरी जारी रखने या सरकार द्वारा सीधे सेवा में शामिल किए जाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी मांगों को स्वीकार किया गया, तो पूरी व्यवस्था में अराजकता फैल जाएगी। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने बिलासपुर जिला के निर्मल सिंह और अन्य आउटसोर्स कर्मियों द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।
बिलासपुर के कलोल उपमंडल की ‘मलारी, बल्हसीणा’ लिफ्टिंग पेयजल योजना में पंप ऑपरेटर और हेल्पर के रूप में काम कर रहे कर्मियों ने कोर्ट से मांग की थी कि उन्हें नौकरी से न हटाया जाए और उनकी सेवाओं को नियमित करने के लिए नीति बनाई जाए।
इन कर्मियों को ठेकेदार ने काम पर रखा था, जिसका 36 महीने का ठेका मार्च 2020 में समाप्त हो गया। इसके बाद विभाग ने वार्षिक रखरखाव का काम नए ठेकेदार को सौंप दिया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें बिना कोई नोटिस दिए तीन फरवरी, 2020 को मौखिक रूप से काम से हटा दिया गया, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम का उल्लंघन है।
राज्य सरकार ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ठेकेदार के कर्मचारी थे, न कि सरकारी विभाग के। आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से रखे गए कर्मचारियों को मुख्य नियोक्ता से सेवा विस्तार मांगने का कोई अधिकार नहीं है।
नए ठेकेदार ने स्पष्ट किया कि उसने अपने स्तर पर आउटसोर्स आधार पर नए श्रमिक रखे हैं और पुराने ठेकेदार का कोई भी कर्मचारी वर्तमान में योजना में कार्यरत नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि जब किसी योजना के रखरखाव का ठेका केवल निश्चित अवधि (जैसे 36 महीने) के लिए दिया जाता है, तो उस ठेकेदार के कर्मी नए ठेकेदार के पास अपनी सेवाएं जारी रखने का दावा नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि वे 2013 से काम कर रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार ठेकेदार को काम का आबंटन ही 2017 में हुआ था।
कर्मी इससे पहले के नियोजन का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके। कोर्ट ने याचिका को आधारहीन और मेरिट से परे मानते हुए खारिज कर दिया।

