कविता शीर्षक – काली घटा चंबा पर छाई लोग कर रहे त्राहि- त्राहि

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कविता शीर्षक – काली घटा चंबा पर छाई लोग कर रहे त्राहि- त्राहि : लेखक – अभिलाष शर्मा 8894521996

काली घटाओं ने कहर बरपाया, बादल फटा, शहर बहा ले गया। रावी के रौद्र बहाव में सब कुछ डूबा, माँ की गोद, बच्चो का सपना छीन लिया।

तीन दिन से अंधेरा ही अंधेरा है, न बिजली की रोशनी, न आशा का सवेरा है। टूटी हुई डगर पर कोई राह नहीं, फोन की घंटी भी अब साथ नहीं।

कितनों ने अपनी सांसें गंवाईं, कितनों की हंसी खामोश हो गई। कुछ अब भी मलबे में दबी पुकार हैं, कुछ आंखें अपनों की राह तक रही।

हे पहाड़ों के देवता, दया करो, इन मासूमों पर कृपा करो। टूटे दिलों को सहारा दो, चंबा को फिर से उजियारा दो।

चंबा के अँधेरों में घिरी ये घड़ी, बारिश ने बाँध दी हर राह की झड़ी। सड़कें टूटीं, पुल जर्जर हुए, संचार भी टूटे, जैसे सब कुछ थम गया हो।

मणिमहेश की यात्रा जैसे रुकी राहों में, प्रशासन ने कहा ठहराव है ठीक समय का। पर किसने सोचा इन गर्जन भरी घटाओं को? किसने देखा इन अनजानी पीड़ाओं को?

सरकार सुनो, अब जागो और समझो, हवाई निगरानी से सच्चाई को जानो। राहत की डोर थामो, बचाव की ज्योति जलाओ, चंबा के वीरों की आशा फिर से जगाओ।

ना हो विफल यहाँ कोई योजना, कोई प्रयास, सब मिलकर सँवारें इस पर्वत की आस। बारिश की विपदा चाहे कितनी भी गहरा हो, चंबा की धरा पर फिर खुशियों का दीया रोशनी से भर दो।

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