पानी की कहानी, जिंदा दफन हो गई हिमाचल की रानी, जानिए चंबा की पौराणिक कहानी

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चम्बा – भूषण गुरुंग

हिमाचल की शांत वादियों में एक ऐसी कहानी बसती है, जहां एक रानी ने ताज नहीं, बल्कि अपनी जान को चुना…और अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान अपनी अपनी प्रजा की प्यास बुझाने के लिए दिया। यह सिर्फ एक गाथा नहीं, बल्कि त्याग, कर्तव्य और प्रेम की वो अमर मिसाल है, जिसने चंबा की रानी सुनयना को देवी बना दिया। चंबा की धरती आज भी उनके बलिदान की साक्षी है, जिसे हर साल सूही माता मेला के रूप में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।

चम्बा का ऐतिहासिक एवं जिला स्तरीय तीन दिवसीय सूही माता मेला, जिसका आज विधिवत आरंभ हो गया, ये मेला पिछले 1100 साल से मनाया जा रहा है। कहा जाता है कि करीब 1100 साल पहले जब राजा साहिल वर्मन ने चंबा नगर की स्थापना की, तब यहां पानी की भारी कमी थी। लोगों को दूर स्थित रावी नदी से पानी लाना पड़ता था, जिससे जीवन बेहद कठिन हो गया था।

राजा ने कई प्रयास किए—कूहलें बनवाईं, नालों का रुख मोड़ा, लेकिन पानी शहर तक नहीं पहुंच पाया। फिर किसी ने राजा से इंसानी बलि देने को कहा, ताकि रुकावट डालने वाली बुरी आत्माएं खुश हों और उन पर जीत हासिल हो सके। यह भी कहा जाता है कि राजा को सपने में निर्देश मिला कि रुकावटों से छुटकारा पाने के लिए उन्हें या उनके बेटे को बलि देनी होगी। राजा अपनी जान देना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोका गया।

सबसे बड़े बेटे युगक्कर वर्मन के बलिदान से भी राज्य का बाल-बांका हो सकता था। इसलिए उन्हें भी बलि नहीं चढ़ने दिया गया। कहा जाता है जब रानी सुनयना को इस सब के बारे में पता चला तो रानी ने अपने पति या बेटे के स्थान पर अपने जीवन का बलिदान देने की पेशकश की। हालांकि हालांकि राजा और प्रजा नहीं चाहती थी कि रानी पानी की खातिर अपना बलिदान दें, लेकिन रानी ने अपना हठ नहीं छोड़ा और लोकहित में जिदा दफन होने के लिए सबको मना भी लिया।

कहा जाता है कि जिस वक्त रानी पानी के मूल स्त्रोत तक गई तो उसके साथ अनेक दासियां, राजा, पुत्र और हजारों की संख्या में लोग भी पहुंच गए थे। बलोटा गांव से लाई जा रही कूहल पर मलौना नाम की जगह पर रानी जिंदा दफन हो गई। उनके बलिदान के बाद, चंबा शहर से पानी बहुत ज़्यादा बहने लगा, यह शाह-मदार पहाड़ के नीचे इकट्ठा होता था। इस जगह का नाम राजनौण रखा गया, जो शाही फव्वारा घर था। पुराने ज़माने में ये जगहें त्योहार मनाने के लिए काफी खास होती थीं।

रानी के बलिदान के बाद, राजा बहुत दुखी हो गए। उन्हें लगातार अपनी रानी की याद आ रही थी। एक बार उन्हें सपने में रानी दिखाई दीं। रानी ने उनसे कहा कि वे उनकी चिंता न करें, बल्कि उनकी याद में चैत्र के महीने में एक मेला लगाने की सलाह दी। उस मौके पर, एक कुंवारी लड़की यहाँ पूजा कर सकती है। गद्दी समुदाय की औरतों को अच्छा खाना खिलाया जा सकता है। मरी हुई रानी ने उन गद्दी औरतों के बीच मौजूद रहने का वादा किया।

फिर इसके बाद राजा ने अपनी रानी से मिलने की आस में चैत्र महीने में शाह-मदार पहाड़ की ढलान पर एक मेला लगाया और गद्दी महिलाओं को अच्छा खाना खिलाया तब से हर चैत्र महीने में यह मेला लगता है। संभवतः यह एकमात्र ऐसा मेला है, जिसे महिलाओं के मेले (औरतों का मेला) के नाम से जाना जाता है। पहले के समय मेले के दौरान पुरुषों का प्रवेश बिल्कुल वर्जित था। सिर्फ महिलाएँ और बच्चे ही इसमें शामिल होते थे।

हालांकि वक्त से साथ धीरे-धीरे मेले को मनाने का तरीका भी बदल गया, लेकिन इसकी आस्था और परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है। कहा जाता है कि बलि के लिए जाते समय रानी ने लाल वस्त्र पहने और पूरा श्रंगार किया। चंबियाली भाषा में लाल रंग को सुहा भी कहा जाता है, इसलिए रानी का नाम सुही प्रसिद्ध हो गया। इसी वजह से मेले का नाम भी सूही मेला पड़ गया।

जानकारी के अनुसार सूही माता का मंदिर वहीं स्थित है, जहां रानी के पैर में चोट लगी थी और उनके पैर के अंगूठे से खून निकला था। जो पत्थर उन्हें लगा था, उसे यहां सूही माता के रूप में पूजा जाता है। जहां से रानी ने आखिरी बार चंबा की तरफ देखा था। अभी वहीं पर छतरी के आकार का एक मंदिर बना हुआ है। मलूणा में आज भी जहां रानी ने चंबा के लोगों के लिए पानी की खातिर अपनी जान दी थी, उनकी समाधि पर उनके पैरों के निशान और कुछ त्रिशूल हैं।

इस मेले के दौरान आज भी पारंपरिक लोक गीत गाया जाते हैं नृत्य किया जाता है और गीतों के जरिए मां सूही को याद किया जाता है उनके बलिदान को याद किया जाता है. हालांकि पहले ये मेला काफी लंबा चलता था,. अब बस 3 दिन के लिए ही ये मेला लगता है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्ता आज भी उतनी ही गहरी है।

सूही माता मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस महान बलिदान की जीवंत याद है, जिसने एक रानी को देवी बना दिया और आने वाली पीढ़ियों को हमेशा के लिए यह सिखा दिया कि सच्चा प्रेम और कर्तव्य क्या होता है।

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