तकरीबन 55 घंटे में नाहन से चूड़धार पैदल पहुंच गया भोले का भक्त “विक्रम सिंह”

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सिरमौर – नरेश कुमार राधे 

कहते हैं, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। कठिन मंजिल को भी हौसले की बदौलत हासिल किया जा सकता है।

जून की तपती गर्मी में जहां कोई चंद मीटर भी पैदल नहीं चलना चाहता। वहीं 10 जून को सुबह साढ़े तीन बजे नाहन से चूड़धार चोटी के लिए पैदल रवाना हुए ” विक्रम सिंह” ने रविवार दोपहर 12:06 पर अपनी मंजिल को हासिल कर लिया है।

इसके बाद वो रविवार रात 9 बजे वापिस नौहराधार बेस कैंप में भी पहुंच गया है। नाहन से चूड़धार पैदल पहुंचने में विक्रम सिंह को लगभग 55 घंटे लगे।

10 जून की शाम को ददाहू से लगभग 5 किलोमीटर आगे विक्रम सिंह को “अभिलाष” ने भी ज्वाइन कर लिया था। इसके बाद का सफर दोनों दोस्तों ने एक साथ ही तय किया।

बता दें कि पैदल यात्रा के तीसरे दिन विक्रम सिंह ने चूड़धार चोटी पर भोले शंकर का आशीर्वाद लेकर वापिस नौहराधार पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित किया था। चोटी पर भगवान शिरगुल महाराज के प्राचीन मंदिर में भी शीश नवाया। लक्ष्य में वो कामयाब हो गया है।

पैदल ही नाहन से चूड़धार चल दिया भोले का भक्त विक्रम, ऐसा पहली बार 

फोन पर बातचीत में विक्रम सिंह ने बताया कि नौहराधार की वापसी में दोस्त की तबीयत खराब होने के कारण थोड़ा वक्त लग गया। सफर के दौरान दोस्तों को हल्की-फुल्की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा।

शुक्रवार को संगड़ाह से कुछ किलोमीटर पहले एक शख्स ने भोले के भक्तों को परेशानी में भी डाला। हालांकि बाद में सब कुछ ठीक-ठाक रहा।

बातचीत के दौरान विक्रम सिंह ने कहा कि नाहन से चूड़धार तक पहुंचने में करीब 55 घंटे का वक्त लग गया, लेकिन ये वक्त कम भी हो सकता है, बशर्ते कि रास्ते में रुकने का समय कम खर्च किया जाए।

उन्होंने बताया कि वह सोमवार सुबह नौहराधार से संगड़ाह के लिए रवाना होंगे। पहला पड़ाव संगड़ाह में होगा। अगले दिन नाहन के लिए पैदल ही रवाना होंगे।

वापसी में भी संगड़ाह से सीधे नाहन का अंतिम पड़ाव काफी लंबा होगा। इस दौरान भोले के भक्तों को लगभग 70 किलोमीटर का सफर करना है। यदि औसत की बात की जाए तो आखिर में एक दिन की औसत 40 किलोमीटर होगी।

उधर, अभिलाष ने बताया कि सफर बेहद ही रोमांचित रहा है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि वापसी का सफर भी काफी रोमांचित होने वाला है।

उन्होंने बताया कि वह पहले संगड़ाह से विक्रम को ज्वाइन करना चाहते थे, लेकिन उनकी रवानगी के बाद मन में जिज्ञासा पैदा हो गई। तुरंत ही दोपहर की बस पकड़ कर रवाना हो गए थे, विक्रम उन्हें ददाहू से करीब 5 किलोमीटर आगे मिला फिर वो फौरन बस से उतर कर साथ हो गया।

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