डोली के सफर में बेटी की भूख का सहारा थे कलीरे, आज भी समेटे हैं मां-बाप का अथाह प्यार

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शाहपुर – नितिश पठानियां

भारतीय विवाह केवल दो इनसानों का मिलन नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और सदियों पुरानी परंपराओं का उत्सव है। शादी की हर रस्म अपने भीतर कोई न कोई संदेश और जीवन दर्शन समेटे हुए है। ऐसी ही एक परंपरा है दुल्हन को कलीरे पहनाने की रस्म।

आज कलीरे दुल्हन के श्रृंगार का आकर्षक हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इनकी शुरुआत केवल सुंदरता के लिए नहीं हुई थी। इसके पीछे माता-पिता का अपनी बेटी के प्रति अथाह प्रेम, चिंता और उसके सुरक्षित भविष्य की कामना छिपी हुई थी।

आज के दौर में जब शादी के कुछ घंटों बाद ही दुल्हन अपने नए घर पहुंच जाती है, तब यह कल्पना करना कठिन है कि एक समय ऐसा भी था जब विदाई के बाद ससुराल तक पहुंचने में पूरा दिन, कई बार दो-दो दिन लग जाते थे।

विशेषकर हिमाचल जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में ऊबड़-खाबड़ रास्ते, घने जंगल, नदियां और लंबी पैदल यात्राएं आम बात थीं। उस समय न पक्की सडक़ें थीं, न वाहन और न ही रास्ते में भोजन की सुविधाएं।

ऐसे समय में माता-पिता अपनी बेटी के कलीरों में मखाने, काजू, बादाम, अखरोट की गिरी, नारियल, किशमिश और अन्य सूखे मेवे बांधते थे। इनका उद्देश्य केवल रस्म निभाना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि यदि लंबी यात्रा के दौरान बेटी को भूख लगे तो उसके पास कुछ खाने के लिए अवश्य हो। यह माता-पिता का वह स्नेह था जो विदाई के बाद भी बेटी के साथ चलता था।

कलीरे केवल सूखे मेवों का गुच्छा नहीं थे, बल्कि उनमें अनगिनत भावनाएं बंधी होती थीं। हर मखाना, हर बादाम और हर नारियल का टुकड़ा मानो यह कहता था—बेटी, हम भले ही तुम्हारे साथ नहीं हैं, लेकिन हमारी दुआएं, हमारी चिंता और हमारा प्यार हर कदम पर तुम्हारे साथ रहेगा।

हिमाचल प्रदेश में विवाह की अनेक परंपराएं प्रकृति, परिवार और सामाजिक मूल्यों से जुड़ी रही हैं। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने यहां के रीति-रिवाजों को भी व्यवहारिक बनाया। कलीरों में बांधे जाने वाले सूखे मेवे इसी व्यवहारिक सोच का सुंदर उदाहरण हैं। यह परंपरा हमें बताती है कि उस समय की रस्में केवल धार्मिक नहीं थीं, बल्कि जीवन की वास्तविक जरूरतों से भी जुड़ी थीं।

समय बदला, परिवहन के साधन बदले और जीवनशैली भी बदल गई। आज दुल्हन कार, बस या अन्य आधुनिक वाहनों से कुछ ही घंटों में अपने ससुराल पहुंच जाती है। रास्ते में भोजन और अन्य सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध हैं।

इसी कारण अब असली सूखे मेवों की जगह सोने-चांदी जैसी चमक वाले, मोतियों, घंटियों, शंख, फूलों और अन्य सजावटी वस्तुओं से बने खूबसूरत कलीरे पहनाए जाते हैं। इनकी सुंदरता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, लेकिन इनके पीछे छिपी भावना आज भी वही है।

इतिहास का ज्ञान नहीं

दुर्भाग्य की बात यह है कि आधुनिक पीढ़ी का बड़ा हिस्सा इन परंपराओं के वास्तविक इतिहास से परिचित नहीं है। कई लोग कलीरों को केवल फैशन, फोटोशूट या सोशल मीडिया ट्रेंड का हिस्सा मानते हैं। जबकि यह परंपरा भारतीय परिवार व्यवस्था, बेटी के सम्मान और माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम की जीवंत मिसाल है।

क्या भावी पीढ़ी जान पाएगी सच

लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि हमारी परंपराओं को केवल निभाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके पीछे छिपे अर्थ को समझना और आने वाली पीढिय़ों तक पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है। जब बच्चे इन परंपराओं का इतिहास जानेंगे, तभी वे अपनी संस्कृति से भावनात्मक रूप से जुड़ पाएंगे।

मखाने-काजू-बादाम बांधने का यह था मकसद

शाहपुर की कमला देवी, सुनीता शर्मा, आशा ठाकुर, निर्मला देवी, मीना शर्मा, रेखा ठाकुर, संतोष देवी, उषा शर्मा, कविता देवी और पूनम ठाकुर ने बताया कि कलीरे केवल दुल्हन के श्रृंगार का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह हमारी पुरानी संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक हैं।

पहले कलीरों में मखाने, काजू, बादाम और नारियल बांधे जाते थे, ताकि लंबी यात्रा के दौरान बेटी को भूख लगने पर सहारा मिल सके। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को इन परंपराओं का महत्व जरूर बताया जाना चाहिए, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत जीवित रहे।

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