शौर्यगाथा : सीने पर गोली खाकर साथियों की जान बचा गया हिमाचल का वीर सपूत शहीद जंगबीर सिंह

--Advertisement--

हिमखबर डेस्क

सिरमौर की शिवालिक पहाड़ियों में बसे नाहन विकासखंड के कंडईवाला गांव की मिट्टी आज भी एक ऐसे वीर सपूत की कहानी सुनाती है, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।नायक जंगबीर सिंह का जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

एक दिसंबर 1964 को किसान भरत सिंह और माता कृष्णी देवी के घर जन्मे जंगबीर सिंह साधारण परिवार से थे। आर्थिक परिस्थितियाँ सीमित थीं, लेकिन उनके सपने बहुत बड़े थे। बचपन से ही उनके भीतर देश सेवा का जज्बा था।

खेतों की मेड़ों पर दौड़ता वह बालक एक दिन भारतीय सेना की प्रतिष्ठित सैन्य गुप्तचर शाखा का हिस्सा बनेगा, यह शायद तब किसी ने नहीं सोचा था। अपनी मेहनत, अनुशासन और समर्पण के बल पर उन्होंने सेना में स्थान बनाया और परिवार का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया।

जीवन में खुशियों ने दस्तक दी जब उनका विवाह संतोष कुमारी से हुआ। कुछ समय बाद जुड़वां बेटों के जन्म से घर खुशियों से भर गया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

साल 1996 में उनकी तैनाती असम के गुवाहाटी में थी, जहां यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम के खिलाफ सेना का अभियान चल रहा था। 20 अगस्त 1996 की वह रात बेहद खतरनाक थी। नायक जंगबीर सिंह अपनी टुकड़ी के सबसे आगे चल रहे थे।

सैन्य गुप्तचर शाखा के जवान होने के नाते वे जानते थे कि सबसे आगे होना मतलब सबसे पहले खतरे का सामना करना है। तभी घात लगाकर बैठे आतंकवादियों ने अचानक गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।

गोलीबारी के बीच एक गोली सीधे उनके सीने में आ लगी। मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली। साथियों का कहना था कि यदि जंगबीर सबसे आगे न होते, तो कई जवानों की जान जा सकती थी। उन्होंने अपनी शहादत देकर अपने साथियों की जिंदगी बचा ली।

जब उनकी शहादत की खबर गांव पहुंची तो हर आंख नम हो गई। पत्नी संतोष कुमारी ने आँसुओं के बीच गर्व के साथ अपने वीर पति को अंतिम विदाई दी। सैन्य सम्मान के साथ उनका पार्थिव शरीर गांव लाया गया, जहां हजारों लोग “भारत माता की जय” के नारों के साथ उमड़ पड़े।

सबसे भावुक पल वह था, जब उनके छोटे-छोटे जुड़वां बेटों ने रोते हुए अपने पिता को मुखाग्नि दी। उस दृश्य ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया। पति की शहादत के समय संतोष कुमारी की उम्र मात्र 22-23 वर्ष थी। उन्हें सरकारी नौकरी का प्रस्ताव मिला, लेकिन गोद में दुधमुंहे बच्चों की जिम्मेदारी थी।

उन्होंने संघर्षों से भरी जिंदगी को अकेले संभाला, दोनों बेटों को पढ़ाया-लिखाया और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया। आज दोनों बेटे सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं, जो जंगबीर सिंह के सपनों की सबसे बड़ी विरासत हैं।

साल 1998 में देश ने शौर्य चक्र से नायक जंगबीर सिंह को सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी वीरता, त्याग और अदम्य साहस को राष्ट्र का सलाम था।

शहीद नायक जंगबीर सिंह आज भी हर उस सैनिक की प्रेरणा हैं, जो देश के लिए जीने और मर मिटने का संकल्प लेकर सीमा पर खड़ा है। उनका नाम और बलिदान हिमाचल की वादियों में हमेशा अमर रहेगा।

शहीद नायक जंगबीर सिंह अमर रहें।

--Advertisement--
--Advertisement--

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

--Advertisement--

Popular

More like this
Related

गर्मियों में ‘छीछा’ नहीं खाया तो क्या खाया, लाजवाब है हिमाचल की यह चटनी

हिमखबर डेस्क आम का सीजन है और गर्मियां चरम पर हैं।...

तो गांव में कोई कुंवारा नहीं रहता…पंचायत चुनावों के बीच सामने आई नौजवानों की टीस

हिमखबर डेस्क हिमाचल प्रदेश में इन दिनों पंचायत चुनावों का शोर...