नमसा योजना से खुशहाल हुए किसान

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कोटला – स्वयंम

कृषि उत्पादकता को सतत बनाना प्राकृतिक संसाधनों जैसे मृदा एवं जल की गुणवत्ता और उपलब्धता पर निर्भर करता है। कृषि विभाग कोटला द्वारा ग्राम पंचायत दुराना और कटोरा में कृषि विकास अधिकारी कोटला डॉक्टर विशाखा द्वारा किसानों को जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि कृषि सिंचित कृषि जोतों के विकास के साथ- साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण देश में खाद्यान्नों की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने की कुंजी है।

इस दिशा में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन तैयार किया गया है, जिससे कि एकीकृत खेती, जल प्रयोग कौशल, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और संसाधन संरक्षण को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हुए विशेष रुप से वर्षा सिंचित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सके।

नमसा का उद्देश्य भारतीय कृषि के 10 मुख्य आयाम नामतः उन्नत फसल बीज, पशुधन, मत्स्य पालन, जल प्रयोग दक्षता, उन्नत फार्म आजीविका विविधीकरण शामिल है। इस पर फोकस करते हुए अनुकूलन उपायों के अंगी करण की श्रृंखला के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा देना है।

वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास (आर ए डी) कृषि प्रणालियों के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के विकास और संरक्षण के लिए क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण अपनाता है। वर्तमान में विकासखंड नगरोटा सूरियां में कृषि विभाग के अंतर्गत दो क्लस्टर कार्यशील है – दुराना तथा कटोरा।

दोनों क्लस्टर वर्ष 2014-15 से आरंभ किए गए थे। दुराना तथा कटोरा के किसानों को फसल प्रणाली के अंतर्गत गेहूं ,धान, वरसीन, कंगनी, तथा सब्जियों के बीज जैसे फ्रांस बीन, भिंडी ,मटर, मूली ,प्याज, धनिया, पालक आदि के बीच उपलब्ध कराए गए हैं।

बागवानी के अंतर्गत मौसम में फलदार पौधे जैसे आम ,लीची, नींबू, संतरा ,आमला, माल्टा, अमरुद, अनार तथा सेब के पौधे किसानों को वितरित किए गए हैं । केंचुआ खाद बनाने के लिए वर्मी बेड वितरित किए गए हैं। तथा सामुदायिक टैंक मधुमक्खी पालन मत्स्य पालन हरित गृह का भी प्रावधान है।

कृषि विकास अधिकारी कोटला डॉक्टर विशाखा के अनुसार यह योजना कृषि के लिए एकीकृत बहु घटकों जैसे की फसल बागवानी पशुधन मछली पालन कृषि आधारित आय सृजित करने वाली गतिविधियों के साथ बानिकी और मूल्य संवर्धन द्वारा समुचित कृषि प्रशिक्षण प्रदान करती है ।

ताकि ना केवल किसानों को आजीविका के बनाए रखने हेतु कृषि आय को अधिकतम करने में अपितु सूखा, बाढ़ अथवा मौसम संबंधी अन्य चरम घटनाओं के प्रभावों को कम करने के लिए किसानों को सक्षम बनाया जा सके।

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