नई व्यवस्था: ट्रैफिक जाम में नहीं फंसेगी जान, एंबुलेंस को रास्ता दिलाएंगे हिमाचल पुलिस के बाइक राइडर

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हिमखबर डेस्क

आपात स्थिति में मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए हिमाचल पुलिस ने विशेष व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में ट्रैफिक पुलिस के बाइक राइडर गंभीर चिकित्सा आपात परिस्थितियों में एंबुलेंस को ट्रैफिक जाम से सुरक्षित निकालने में मदद करेंगे।

पुलिस ने लोगों से भी अपील की है कि एंबुलेंस का सायरन सुनते ही उसे तुरंत रास्ता दें, क्योंकि कुछ मिनटों की देरी भी मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है। पुलिस के अनुसार सड़क दुर्घटना, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर प्रसूति जटिलताओं और अन्य जीवनरक्षक चिकित्सा परिस्थितियों में अस्पताल तक पहुंचने का प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है।

ऐसे मामलों में यदि एंबुलेंस ट्रैफिक जाम में फंस जाती है तो मरीज की हालत और गंभीर हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आपात स्थिति में एंबुलेंस को पुलिस एस्कॉर्ट सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए एंबुलेंस चालक, 108 सेवा या अस्पताल का इमरजेंसी विभाग पुलिस कंट्रोल रूम 112 पर सूचना दे सकता है।

कंट्रोल रूम मरीज की गंभीरता का संक्षिप्त सत्यापन करने के बाद संबंधित क्षेत्र की ट्रैफिक यूनिट या पुलिस राइडर को अलर्ट जारी करेगा। इसके बाद निकटतम पुलिस दल एंबुलेंस को जाम से निकालकर अस्पताल तक प्राथमिकता के आधार पर पहुंचाने में सहायता करेगा।

पुलिस ने स्पष्ट किया है कि एंबुलेंस को रास्ता देना केवल नैतिक दायित्व ही नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी भी है। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 और उससे संबंधित नियमों के अनुसार सभी वाहन चालकों को एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड तथा अन्य आपातकालीन वाहनों को प्राथमिकता देते हुए रास्ता देना अनिवार्य है। चालक को सुरक्षित तरीके से वाहन को सड़क के किनारे करना चाहिए और एंबुलेंस के लिए मार्ग खाली करना चाहिए।

10 हजार जुर्माना और 6 माह की कैद का प्रावधान

वर्ष 2019 में संशोधित मोटर वाहन कानून के तहत एंबुलेंस को रास्ता न देना गंभीर उल्लंघन माना गया है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 194-ई के अनुसार एंबुलेंस या फायर सर्विस वाहन को रास्ता न देने वाले चालक पर 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

वहीं, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर बाधा उत्पन्न करता है या खतरनाक तरीके से वाहन चलाता है तो उसके खिलाफ धारा 184 सहित अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। गंभीर मामलों में छह माह तक की सजा का भी प्रावधान है।

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