दो साल का ठेका, फिर एक और परीक्षा — चयन का अपमान या प्रक्रिया का मज़ाक?

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शिमला – नितिश पठानियां

युवा नेता व सामाजिक कार्यकर्ता गौरव कुमार ने कहा की हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग (HPPSC) जैसी प्रतिष्ठित संस्था वर्षों से राज्य में पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता आधारित चयन प्रक्रिया के लिए जानी जाती रही है। यह संस्था विभिन्न प्रशासनिक पदों के लिए हजारों योग्य युवाओं में से कुछ चुनिंदा उम्मीदवारों का चयन करती है, जो कठिन परीक्षा, इंटरव्यू और गहन मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद सफल होते हैं।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इसी चयन के बाद सरकार उन्हें नियमित नियुक्त नहीं करती, बल्कि ‘ट्रेनिंग’ के नाम पर अनुबंध पर रखती है और फिर उसी पद पर स्थायी नियुक्ति के लिए एक और परीक्षा की अनिवार्यता जोड़ देती है।

यह सवाल उठता है कि जब एक उम्मीदवार पहले ही HPPSC जैसी कठिन परीक्षा को पास कर चुका है, तो उसे दोबारा परीक्षा देने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? क्या पहली परीक्षा केवल औपचारिकता थी? यह व्यवस्था न केवल चयन प्रक्रिया का अपमान है, बल्कि उन युवाओं की मेहनत, समय और मनोबल का भी निरादर है, जिन्होंने इस परीक्षा को जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई की तरह लड़ा।

गौरव कुमार ने कहा की. इस नीति की असलियत और भी अधिक चिंताजनक है। सरकार चयनित उम्मीदवारों को केवल “ट्रेनिंग” की आड़ में अनुबंध पर रखती है ताकि यह दिखाया जा सके कि अभी नियमित नियुक्ति नहीं हुई है। इससे सरकार को कानूनी दायित्वों से बचने का रास्ता मिल जाता है।

इस तथाकथित प्रशिक्षण अवधि का उद्देश्य साफ है—कोर्ट में यह तर्क देना कि नियुक्ति अस्थायी है, और इस प्रकार चयनित उम्मीदवारों को संवैधानिक अधिकारों जैसे स्थायित्व, सेवा लाभ, वेतनमान और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखा जाए।

इस दोहरी नीति के कारण चयनित अधिकारी असुरक्षा, भ्रम और मानसिक दबाव की स्थिति में आ जाते हैं। वे पूर्णकालिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं, जनता के साथ सीधे संवाद करते हैं, प्रशासनिक निर्णय लेते हैं—लेकिन सरकार उन्हें स्थायी सेवक मानने से इनकार कर देती है। यह नीतिगत ढोंग और प्रशासनिक तिकड़म योग्यता की नहीं, बल्कि युवाओं की मजबूरी की मार है।

सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह चयन प्रक्रिया का सम्मान करती है या उसे केवल एक कानूनी औजार मानती है। यदि चयनित उम्मीदवारों को दोबारा परीक्षा के लिए बाध्य किया जाता है, तो HPPSC की परीक्षा का औचित्य ही खत्म हो जाता है। यह स्थिति युवाओं को गुमराह करती है और एक स्थायी नौकरी की उम्मीद को एक अस्थायी अनुबंध में तब्दील कर देती है।

हम सरकार से मांग करते हैं कि वह इस दोहरी नीति को तुरंत वापस ले, चयनित उम्मीदवारों को प्रशिक्षण के नाम पर ठेके पर रखने की परंपरा समाप्त करे, और नियुक्ति के दिन से ही उन्हें नियमित सेवक के रूप में मान्यता दे। यह केवल प्रशासनिक सुधार की बात नहीं है, यह न्याय, संवैधानिक मूल्यों और युवाओं के भविष्य का सवाल है।

अगर सरकार वाकई योग्यता का सम्मान करती है, तो उसे चयन प्रक्रिया को औपचारिकता नहीं, एक वैध और पूर्ण निर्णय मानना होगा। वरना यह नीति योग्यता का नहीं, शोषण का प्रतीक बनकर रह जाएगी।

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