काँगड़ा के किसान ने दिखाई काला चावल उगाने की हिम्मत, मार्केट में बिकता है कई गुना महंगा, पढ़ें

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हिमखबर डेस्क

सालाना 150 हजार मीट्रिक टन धान उगाने वाले हिमाचल ने पहली बार काले चावल की खेती करके इतिहास रच दिया है। मणिपुर की तर्ज पर कांगड़ा जिला के किसान सुरेंद्र लिहाण ने पांच माह में यह फसल तैयार करके कृषि विशेषज्ञों को चौंका दिया है।

साल 1948 से चल रहा कृषि विभाग व मलां राइस रिसर्च सेंटर अब तक काले धान पर कोई रिसर्च नहीं कर पाया है। कांगड़ा शहर के निकट इच्छी पंचायत के मंगरेहड़ गांव निवासी सुरेंद्र लिहाण ने काले चावल का बीज मणिपुर राज्य से आनलाइन मंगवाया था।

उन्होंने जून के पहले सप्ताह में आधा किलो पनीरी खेत में बीजी तथा अगले 22 दिन के भीतर इसकी रोपाई अपने एक कनाल खेत में कर दी। सुरेंद और उनका बेटा विशाल लिहाण इसमें देसी खाद डालते रहे। इसी बीच धान का पौधा पांच फीट तक लंबा हुआ, तो हर कोई हैरान रह गया। धान पर सिल्ला आया,तो उसकी लंबाई एक फुट तक थी। इस धान का सिल्ला भी काला है और इसमें निकलने वाला चावल भी।

अमूमन आम चावल की फसल 100 से 120 दिन में तैयार होती है, जबकि काले चावल को तैयार होने में पांच माह तक लग जाते हैं। नवंबर में जब किसान रबी की प्रमुख फसल गेहूं को बीज रहे हैं, तो सुरेंद्र का काला धान पककर तैयार हुआ है। इसकी उन्होंने थ्रेशिंग कर ली है। इसमें 50 किलो से ज्यादा धान निकला है।

सुरेंद्र का मानना है कि इस धान की पनीरी अप्रैल अंत में बीजी जाए, तो यह पूरी तरह सफल होगा। अगले सीजन में कोई कमी नहीं आएगी।

बड़े काम का है काला चावल

आम चावल 15 से लेकर 80 रुपए तक बिकता है, लेकिन काला चावल ई कामर्स प्लेटफार्म पर ही 500 रुपए प्रति किलो तक बिकता है। इसका प्रमुख कारण इसके औषधीय गुण हैं। कैंसर के खिलाफ रामबाण और शुगर-फैट तेजी से कम करना इसकी खूबियां हैं। विटामिन बी और ई होने के अलावा यह पाचन शक्ति बढ़ाने में भी सहायक है। यह कम पानी में भी तैयार होता है।

इस बारे में जानकारी देते हुए साइंटिस्ट इंचार्ज, मलां राइस रिसर्च सेंटर डा एडी बिंद्रा ने बताया कि मलां रिसर्च सेंटर ने धान की 11 किस्में तैयार की हैं। रिसर्च सेंटर कई किस्मों पर शोध कर रहा है। अभी काले चावल पर कोई रिसर्च नहीं हुई है।

वहीं, कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डा राहुल कटोच का कहना है कि काला चावल बहुत फायदेमंद है। यह हिमाचल में हो सकता है। इसका पौधा लंबा होता है। पकने में ज्यादा समय लेता है। हमारे किसान खुद अब आगे आ रहे हैं, यह अच्छी बात है। इसे देखा जाएगा कि यह कितना फायदेमंद हो सकता है।

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