सांकेतिक भाषा मूक-बाधिर लोगों के लिए वरदान- नितिश कुमार राठौर 

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भलाड – शिबू ठाकुर

युवा सोच नितिश कुमार राठौर ने अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संकेतिक भाषा का प्रारंभिक प्रमाण पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्लेटो की क्रेटीलस में मिला था।

इस पर सुकरात ने कहा है कि अगर हमारे पास सुनने और बोलने की शक्ति नहीं होती है और हम एक दूसरे से अपना विचार व्यक्त करना चाहते हैं। तो उस स्थिति में हम अपने हाथों, सिर और शरीर के अन्य अंगों द्वारा संकेतों के माध्यम से बातचीत करने की कोशिश करते हैं।

1620 में जुआन पाब्लो बोनेट में मेड्रिड में मूक-बधिर लोगों के संवाद को समर्पित पहली किताब पब्लिश की थी। जिसके बाद 1680 में जोर्ज डालगार्नो ने भी एक और पुस्तक पब्लिश की थी।

इसके बाद 1755 में अब्बे डी लिपि ने पेरिस में बधिर बच्चों के लिए पहला विद्यालय की स्थापना की थी। जिसके बाद 19 वीं सदी में अमेरिका और अन्य देशों में भी बधिर बच्चों के लिए ऐसे अनेक स्कूलों की स्थापना धीरे-धीरे होने लगी ।

23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य संकेतिक भाषा के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस साल अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा की थीम “साइन लैंग्वेज यूनाइट अस” रखा गया है।

साइन लैंग्वेज का मतलब यह नहीं है कि आप इशारों में बात करने के लिए किसी भी तरह के हावभाव या बॉडी लैंग्वेज का उपयोग करें।

हिंदी अंग्रेजी या अन्य किसी भी भाषा की तरह साइन लैंग्वेज की भी अपनी एक व्याकरण, नियम और तरीका है।

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