प्राइमरी स्कूल खनेड़ में पढ़ रहा सिर्फ एक बच्चा

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ऊना जिला के विकास खंड बंगाणा की एक पाठशाला में एक छात्र के लिए अध्यापक और मिड-डे मील कर्मचारी तैनात

ऊना – अमित शर्मा

प्राइमरी स्कूलों में दिन प्रतिदिन बच्चों की कम हो रही संख्या जिला प्रशासन व शिक्षा विभाग की बदतर व्यवस्था को उजागर कर रही है। हालात ये हो गए हैं कि किसी स्कूल में पढ़ाने के लिए टीचर तक नहीं है, तो कहीं सिंगल टीचर बच्चों को पढ़ा रहे हंै।

बंगाणा विकास खंड के तहत प्राइमरी स्कूल खनेड़ की बात करें, तो यहां सिर्फ एक बच्चा ही शिक्षा ग्रहण कर रहा है। अकेले बच्चे की पढ़ाई के लिए एक शिक्षक व एक एमडीएम वर्कर यानी मिड-डे मील कर्मचारी तैनात है।

प्रदेश सरकार अकेले बच्चे की पढ़ाई पर प्रतिमाह 50 हजार रुपए खर्च कर रही है। मिड-डे-मील वर्कर रोजाना एक बच्चे के लिए खाना बना रहा है। वहीं, एक शिक्षक बच्चे को पढ़ाने के लिए तैनात किया गया है।

अगर कहीं शिक्षक को छुट्टी पर जाना पड़ जाए तो स्कूल में ताला लटकाने की नौबत आ जाती है। इस अकेले टीचर को डाक तैयार करनी पड़ रही है, वहीं चुनाव या अन्य सरकारी कार्यों में टीचर की ड्यूटी लगा दी जाए, तो बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो जाती है।

सवाल यह है कि स्कूल में एक अकेले बच्चे की पढ़ाई पर सरकार 50 हजार रुपए क्यों खर्च कर रही है। यहां प्रशासन व शिक्षा विभाग द्वारा स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने प्रयास शून्य दिखाई दे रहे हैं। आलम यह है कि अकेला बच्चा पूरा दिन स्कूल में अकेले पढ़ाई करने को विवश है। अगर बच्चा भी अन्य स्कूल में चला जाए, तो अकेला शिक्षक किसे पढ़ाएगा।

प्रदेश सरकार सभी स्कूलों में इंग्लिश मीडियम शिक्षा देने पर बल दे रही है और वहीं प्रदेश के सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों में डे-बोर्डिंग स्कूल खोलने की बात कर रही है, लेकिन प्राइमरी स्कूलों की व्यवस्था को देख इसका अंदाजा स्वयं ही लगाया जा सकता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है।

जिला ऊना में प्राइमरी टीचर्ज के सैकड़ों पद रिक्त चल रहे हैं, वहीं कई स्कूलों में अध्यापक ही नहीं है। सरकार व प्रशासन के उदासीन रवैये के चलते अभिभावक बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए विवश हो रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों में अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को देखकर किसी तरह फीस का इंतजाम कर रहे हैं।

स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने में कार्रवाई शून्य

सरकार व प्रशासन प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की संख्या को बढ़ाने के लिए कोई उचित कदम नहीं उठा रहे हैं। लोगों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अपने बच्चों के दाखिला करवाने के लिए जागरूक नहीं किया जा रहा है। हालात ये हो रहे हैं कि प्राइमरी स्कूलों में तेजी से बच्चों की संख्या कम हो रही है।

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