कुप्रथा :- “आज भी मुक्त नहीं महिलायें

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पूजा गुप्ता

भारत में न जाने कितनी ही ऐसी कुप्रथाएं और कुरीतियां हैं जिनसे महिलाएं अपने दैनिक जीवन में प्रताड़ित हो रही हैं। एक तरह से देखा जाये तो उन्हें इसकी आदत सी हो गयी है, जो भी महिलायें इन मुद्दों के खिलाफ अपनी बात रखना चाहती भी हैं, उन्हें घरवालों और समाज की दकियानूसी सोच चुप करवाकर बैठा देती है।

केवल शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक व भावनात्मक रूप से भी ऐसी प्रताड़ना हमारी स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों को बढ़ा सकती हैं। आज की पीढ़ी वैसे ही अपने खान-पान और रहन-सहन की वजह से ना जाने कितने ही रोगों का शिकार हो रही है।

ऐसे में अगर बात महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर आ जाये तो इससे ज़रूरी और कुछ नहीं। क़ुदरत ने स्त्रियों को दुनिया चलाने की शक्ति दी है। लेकिन समाज की गढ़ी गयी रूढ़िवादी सोच से पनपी कुछ कुरीतियां इस शक्ति को कमज़ोर करने में आज भी नंबर वन हैं।

सदियों से चली आ रही ऐसी बहुत सी प्रथाएं और मान्यताएँ हैं जो एक औरत की अंतरात्मा को खोखला कर देती हैं। ये स्त्री द्वेषी विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपे जा रहे हैं। हाँ यह ज़रूर है कि धीरे-धीरे शिक्षा व जागरूकता से इनमें बदलाव आ रहा है। पर ग्रामीण क्षेत्रों और पिछड़े इलाकों में ये अब भी चलन में हैं। चाहे बात करें माहवारी से जुड़े मिथकों की या फिर यौन सम्बंधित विषयों की हर तीर का निशाना स्त्रियाँ ही होती हैं।

माहवारी के समय रसोईघर से दूर रहना, मंदिरों के आसपास ना जाना, यहाँ तक की सात दिन घर के बाहर रहना और अलग बर्तनों का इस्तेमाल करना। आज भी ऐसी बहुत-सी बच्चियां और स्त्रियाँ हैं जिन्हें यह प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। उन्हें अपने ही घर के बाहर खाना पकाना पड़ता है। सोना पड़ता है और छुआछूत का सामना करना पड़ता है।

इस समय वैसे ही महिलाएं शारीरिक रूप से दर्द व कमज़ोरी से जूझती हैं, ऐसे में मानसिक प्रताड़ना अलग से दे दी जाती है। गंदे कपड़े का इस्तेमाल और सही खानपान का न मिल पाना तो हम सबको पता ही है। यह सारी चीज़ें कुल मिलाकर एक महिला के प्रजनन स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती हैं।

छोटी उम्र में लड़कियों की शादी करवाना भले ही हमारे देश में बहुत पहले गैरकानूनी करार दिया गया है। लेकिन आज भी यह चीज छुपते-छुपाते हो रही है। समय से पहले शादी होने के कारण लड़कियां शारीरिक रूप से मैच्योर नहीं हो पाती और गर्भवती हो जाती हैं।

इससे उनके प्रजनन स्वास्थ्य पर गलत असर पड़ता है जिससे प्रसव के दौरान कठिनाई भी आ सकती है। यह कठिनाई भविष्य में ख़तरनाक बीमारियों का रूप ले सकती है। लड़की के जन्म होने के बाद भी लड़का पैदा करने की चाह लोगों में बनीं रहती है। इसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयारी हो जाते हैं।

महिलाओं को तांत्रिक व जादू टोना करने वालों के पास ले जाकर झड़वाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है। विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां खिलाई जाती हैं। अनूठी पूजाएं करवाई जाती हैं। इसी के साथ ही बांझपन मिटाने के लिए भी ना जाने कितने अंधविश्वासी उपचार करवाये जाते हैं।

यह जानते हुए भी कि इन कुरीतियों से एक महिला के शरीर पर किस तरह के गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं, लोग अपने“वंश” को आगे बढ़ाने के लिए हर कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी नहीं देखा जाता कि समस्या महिला में है या पुरुष में। किसी भी महिला के साथ घर की चहारदीवारी के अंदर होने वाली किसी भी तरह की हिंसा, मारपीट, उत्पीड़न आदि के मामले इसी के अंतर्गत आते हैं।

महिला को ताने देना, गाली देना, उसका अपमान करना, जबरन शादी के लिए बाध्य करना आदि जैसे मामले भी घरेलू हिंसा के दायरे में आते हैं। पत्नी को नौकरी छोडऩे के लिए मजबूर करना, दहेज की मांग के लिए मारपीट करना आदि सामाजिक कुरीतियों के भंवर जाल में फंसी नारियां सब सहती है नियम मानने पर मजबूर ये महिलायें है।

उन्हें शिक्षा से वंचित रखकर कायदे कानून मे रखा जाता है भले ही ये सब सामने खुल कर नहीं होता पर चोरी चुपके से अकेले में प्रताड़ित किया जाता रहा है। दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां आज भी फैली हुई है। स्त्रियों के विकास में बाधक समाज के कुछ बर्ग उन्हें नौकरी के क्षेत्र में भी आगे बढ़ने नहीं देते।

स्त्री चाहे जिस भी वर्ग जाति समूह की रही हो वह जन्म से ही अपने आपको असहाय और अबला समझकर सदैव पुरुषवादी मानसिकता का शिकार होती रही है। आज समाज में तमाम तरह के बंधनों से जकड़ी महिलाएं स्वयं की मुक्ति और अपनी अस्मिता के लिए देश के हर कोने से आवाज उठा रही हैं।

बुजुर्गों ने तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उस समय परिवारों में ऐसी परम्पराएँ विकसित कर ली जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रगति में बाधक है। जैसे–पर्दा प्रथा एक रूढ़ि है जिसका प्रभाव भारत में स्थित अन्य समाजों पर भी गहरा पड़ा है। पर्दा प्रथा के कारण महिलाएँ घर से बाहर नहीं निकलती है।

बालिकाओं को इसी रूढ़िवाद के कारण स्कूलों में पढ़ने नहीं भेजते थे। महिलाओं की शिक्षा जरूरी नहीं है क्योंकि यह तो पराया धन है। ऐसी मान्यता से आज भी आदिवासी क्षेत्रों में तथा श्रमिक वर्गों में बच्चियों को माता-पिता स्कूल नहीं भेजते हैं। धनार्जन का काम पुरुषों के अधिकार में है।

ऐसी रूढ़िवाद से महिलाएँ पराश्रित यानि परिवार के पुरुषों पर ही आश्रित रहने लगी। इससे उनका जीवन दुखी हो गया। धार्मिक क्षेत्र में भी रूढ़ियाँ या अन्धविश्वास है। पति परमेश्वर की धारणा ने विधवाओं के जीवन को अत्यधिक कष्टमय बना दिया है।

पति की मृत्यु के बाद वह दूसरा विवाह नहीं कर सकती, दूसरी ओर परिवार वाले उसे पारिवारिक सम्पत्ति से भी वंचित कर देते हैं। ईन सारी कुरीतियों को दूर करना चाहिए ईन क्षेत्रों से जहां आज भी जकड़ी है महिलायें। जागरूकता अभियान चलाकर शिक्षित करके नई चेतना उत्पन्न करना चाहिए।

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