
शिमला- जसपाल ठाकुर
शिमला के भट्ठाकुफ्ऱ स्थित शिवालिक इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग में मंगलवार को स्टेट ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) हिमाचल प्रदेश की ओर से अंगदान पर जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किया गया ।
इसमें कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ शमा लोहमी विशेष रूप से उपस्थित रहीं ।कॉलेज प्रधानाचार्या ने अंगदान का शपथ पत्र भरकर छात्राओं को प्रेरित किया।
इस मौके पर बीएससी नर्सिंग तृतीय व चतुर्थ वर्ष की 94 छात्राओं ने अंगदान करने की शपथ ली। कार्यक्रम में आईजीएमसी आई बैंक के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ यशपाल रांटा ने नर्सिंग की छात्राओं को ऑर्गन डोनेशन के बारे में जागरूक किया।
उन्होंने बताया कि लोग मृत्यु के बाद भी अपने अंगदान करके जरूरतमंद का जीवन बचा सकते हैं। उन्होंने बताया कि साल 1954 में देश में पहली बार ऑर्गन ट्रांसप्लांट किया गया था। अंगदान करने वाला व्यक्ति ऑर्गन के जरिए 8 लोगों का जीवन बचा सकता है।
देशभर में प्रति महीने करीब 90,000 जरूरतमंद मरीज ट्रांसप्लांट के लिए इंतजार करते हैं। इनमें से करीब 20 मरीज प्रति महीने अंग ना मिलने के कारण जीवन से हाथ धो बैठते हैं। हर साल करीब दो लाख मरीजों की मौत ऑर्गन फैलियर के कारण होती है। ऐसे मरीजों को अगर समय पर अंग मिल जाते तो आगामी जीवन जी सकते हैं।
वहीं हर साल जहां ढाई लाख कॉर्निया डोनेशन की जरूरत होती है वहीँ महज 50 हजार कॉर्निया का दान होता है। सामान्य तौर पर ब्रेन डेड मरीज अंगदान कर सकता है। वेंटिलेटर पर रखे गए ब्रेन डेड मरीज के परिजनों को कई बार भ्रांति होती है कि उनका मरीज रिकवर कर सकता है, लेकिन अगर मरीज को वेंटिलेटर से हटा दिया जाए तो वह आर्टिफिशियल ऑक्सीजन ना मिलने की वजह से मर जाता है।
इस स्थिति में ऑर्गनस को ब्लड सप्लाई नहीं मिलती है और वे काम करना बंद कर देते हैं। लोगों को ब्रेन डेड और कोमा की अवस्था के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। कोमा से मरीज के रिकवर होने की उम्मीद लगाई जा सकती है लेकिन ब्रेन डेड होने के बाद मरीज जीवित नहीं रह पाता । जीवित अंगदाता किडनी,
लीवर का भाग, फेफड़े का भाग और बोन मैरो दान दे सकते हैं, वहीं मृत्युदाता यकृत, गुर्दे, फेफड़े, पेनक्रियाज, कॉर्निया और त्वचा दान कर सकते हैं।
उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि साल 2010 से आईजीएमसी अस्पताल में आई बैंक खोला गया है, इसके तहत मौजूदा समय तक सैकड़ों मरीजों ने आंखें दान करके जरूरतमंद मरीजों के जीवन में रोशनी भर दी है। इसके अलावा आईजीएमसी शिमला में साल 2019 से लेकर मौजूदा समय तक पांच किडनी ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं।
उन्होंने छात्राओं से अनुरोध करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों में अंगदान को लेकर जागरूकता फैलाएं ताकि जरूरतमंद को नई जिंदगी मिल सके । ऑर्गन ट्रांसप्लांट वाले लाभार्थी मरीज सहजता से 20 से 25 साल तक का जीवन जी पाते हैं।
उन्होंने बताया कि ब्रेन डेड मरीज के परिजनों को अंगदान करने के लिए तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसीलिए अगर लोगों में पहले से अंगदान को लेकर पर्याप्त जानकारी होगी तभी ऐसे मौके जरूरतमंदों के लिए वरदान साबित हो सकते हैं।
कार्यक्रम में नर्सिंग कॉलेज स्टाफ से रचना, नीति, पल्लवी, स्वाति, सोटो के ट्रांसप्लांट कॉर्डिनेटर नरेश कुमार और सोटो मीडिया कंसलटेंट (आईईसी) रामेश्वरी ठाकुर मौजूद रहीं ।
कौन कर सकता है अंगदान
कोई भी जाति धर्म समुदाय का व्यक्ति अंगदान कर सकता है, इसे किसी भी आयु में दान किया जा सकता है। जीवित रहते हुए पंजीकरण करवाया जा सकता है ताकि मृत्यु के बाद अंग दान किया जा सके।
हमारे देश में लोगों में जागरूकता ना होने के कारण अंग दान करने से कतराते हैं, लोगों की इसी भावना को दूर किया जाना जरूरी है। देश में अंगदान की कमी की वजह से ही अंग तस्करी बढ़ रही है क्योंकि लोगों को अब नहीं मिलते हैं तो ऐसे में लोग तस्करों की सहायता लेते हैं
ऑर्गन का लाइफ स्पेन
हृदय को 4 से 6 घंटे, फेफड़े को 4 से 8 घंटे, इंटेस्टाइन को 6 से 10 घंटे, यकृत को 12 से 15 घंटे, पेनक्रियाज को 12 से 14 घंटे और किडनी को 24 से 48 घंटे के अंतराल में जीवित व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित किया जा सकता है।
गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और दुर्घटनाग्रस्त मरीजों के ब्रेन डेड होने के बाद यह प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अस्पताल में मरीज को निगरानी में रखा जाता है और विशेष कमेटी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करती है। मृतक के अंग लेने के लिए पारिवारिक जनों की सहमति बेहद जरूरी रहती है।
