सीना तानकर लड़े, हंसते-हंसते शहीद: शौर्य चक्र विजेता नायक राजेश कुमार की अमर शहादत

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पांवटा साहिब क्षेत्र का माजरा गांव आज भी अपने उस वीर सपूत की शहादत पर गर्व करता है, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। अमर शहीद नायक राजेश कुमार (शौर्य चक्र विजेता) की वीरगाथा केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि देशभक्ति, साहस और सर्वोच्च बलिदान का जीवंत उदाहरण है।

माजरा गांव के एक साधारण परिवार में जन्मे राजेश कुमार बचपन से ही अनुशासनप्रिय, निडर और जिम्मेदार स्वभाव के थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके भीतर देश सेवा का जज़्बा बेहद मजबूत था। गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने भारतीय सेना में जाने का सपना देख लिया था। अपने दृढ़ संकल्प और मेहनत के दम पर उन्होंने भारतीय सेना की फर्स्ट पैरा रेजिमेंट में भर्ती होकर देश सेवा का मार्ग चुना।

सेना में शामिल होने के बाद उन्होंने कठिन प्रशिक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा किया और खुद को एक जांबाज सैनिक के रूप में स्थापित किया। वर्ष 2002 में जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में एक ऑपरेशन के दौरान उन्होंने असाधारण बहादुरी का परिचय दिया। अपनी जान जोखिम में डालकर उन्होंने अपने साथियों की रक्षा की और दुश्मनों को करारा जवाब दिया। उनके इसी अदम्य साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों प्राप्त हुआ और उनकी वीरता की अमिट पहचान बन गया।

राजेश कुमार का सैन्य जीवन लगातार चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। 29 अप्रैल 2012 को जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक के तहत आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान उन्होंने एक बार फिर अपनी वीरता दिखाई। बर्फीली पहाड़ियों में चल रही इस भीषण मुठभेड़ में उन्होंने कई घुसपैठियों को मार गिराया। इसी दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए।

उनकी शहादत की खबर जैसे ही माजरा गांव पहुंची, पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। हर आंख नम थी, लेकिन दिल गर्व से भरा हुआ था। 30 अप्रैल 2012 को आधिकारिक सूचना मिलने के बाद परिवार और ग्रामीण अंतिम दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। 2 मई 2012 को जब उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो हजारों लोगों ने “भारत माता की जय” और “शहीद अमर रहें” के नारों के साथ उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी।

राजेश कुमार अपने पीछे पत्नी राखी वर्मा, सात वर्षीय बेटी तमन्ना और छोटे बेटे लक्ष्य को छोड़ गए। पत्नी राखी ने अपने पति को ड्यूटी पर विदा तो किया था, लेकिन वह उनकी आखिरी मुलाकात साबित हुई। शहादत के बाद उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें सरकारी नौकरी का प्रस्ताव मिला, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश को प्राथमिकता दी और प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने पति के आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

आज भी माजरा गांव में शहीद स्मारक चौक पर उनका नाम हर राहगीर को रुककर सलाम करने पर मजबूर कर देता है। हर साल 29 अप्रैल को गांव में दीप प्रज्वलित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। उस दिन माहौल भावुक हो उठता है। आंखों में आंसू होते हैं, लेकिन सीने में गर्व भी उतना ही गहरा होता है।

नायक राजेश कुमार का यह बलिदान केवल उनके परिवार या गांव तक सीमित नहीं है। यह पूरे राष्ट्र के लिए गर्व की धरोहर है। उनका नाम आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी कहानी बताती है कि सच्चा वीर वही है, जो राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दे।

आज उनके परिवार में पत्नी राखी वर्मा, बेटी तमन्ना और बेटा लक्ष्य हैं। वे हर साल 29 अप्रैल को गर्व और आंसुओं के साथ उन्हें याद करते हैं। वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि किसी सैनिक की शहादत के बाद भी उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। वह हर उस तिरंगे में जीवित रहता है, जो हवा में लहराता है।

उनका नाम हमेशा के लिए उन वीरों में दर्ज हो चुका है, जिन्होंने यह साबित किया कि तिरंगे में लिपटना केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक सैनिक का सबसे बड़ा गौरव होता है।

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