
दुराना- राजेश कुमार
सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होना पढ़ाई का स्तर घटिया होना नहीं बल्कि हजारों की संख्या में हर श्रेणी के अध्यापकों के स्वीकृत पद सालों साल खाली रहना मुख्य कारण है ।
प्रारंभिक शिक्षा की बात करें तो 2018 के उपरांत जेबीटी अध्यापकों की एक भी नियुक्ति न होना और 2018 के उपरांत आज तक हजारों की संख्या में जेबीटी अध्यापकों की सेवानिवृति होने से अनेकों प्राइमरी स्कूलों में एक अध्यापक या किसी स्कूल में एक भी अध्यापक का न होना प्रारंभिक शिक्षा से सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों का भविष्य शिक्षा को लेकर गिरता देखकर अभिभावक विवश हो प्राइवेट स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं।
अतः प्राइमरी से लेकर वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं सहित कालेज यूनिवर्सिटी तक अध्यापकों प्रवक्ताओं के निरंतर खाली पदों को लेकर ही अभिभावकों एवं बच्चों का रुझान सरकारी संस्थानों में कम और प्राइवेट संस्थानों की ओर बढ़ता जा रहा है।
जबकि सरकारी स्कूलों में पदों की रिक्तियों को नजरंदाज करते हुए सरकार एवं शिक्षा विभाग द्वारा अध्यापकों पर अच्छे परिणाम न देने पर कार्यवाही करने के फरमान जारी किए जाते हैं जोकि किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है।
अतः सरकार को समय रहते सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के रिक्त पदों को भरने के लिए गंभीरता से पग उठाने चाहिए ताकि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ सके।
