परम्परागत लोक संस्कृति “मुसाधा -लोक गाथा गायन” का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक

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परम्परागत लोक संस्कृति “मुसाधा -लोक गाथा गायन” का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक, “नेशनल यूथ डेव्लपमेंट सेंटर” समृद्ध परंपरा को सँजोने का प्रयास,

देहरा, शीतल शर्मा

हिमाचली लोक संस्कृति में लोक गाथा गायन की समृद्ध परंपरा प्रचलित है। इन विधाओं में “मुसाधा -लोक गाथा गायन” का विशेष स्थान है! इसी समृद्ध परंपरा को सँजोने का प्रयास “नेशनल यूथ डेवलपमेंट सेंटर” द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय व हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति विभाग के सहयोग एवं निर्देशन में किया जा रहा है।

सेंटर के निर्देशक संजीव जख्मी ने जानकारी देते हुए बताया कि “मुसाधा” में गाथा गायन का प्रसंग गाने के उपरांत बीच-बीच में स्थानीय भाषा में उसकी व्याख्या कथा के रूप में की जाती है। मुसाधा गायन में मात्र दो कलाकार होते हैं। पुरुष कलाकार को ‘घुराई’ और स्त्री कलाकार को ‘घुरैण’ कहते हैं।

मुसाधा लोक कलाकार शायद विश्व में पहला लोक कलाकार है जो एक साथ दो वाद्य यंत्रों को बजाते हुए गाता है। एक हाथ में वाद्ययंत्र खंजरी से ताल बजाता है और दूसरे हाथ से गले में लटका वाद्य यंत्र रुबा ना (तार वाद्य) से संगीत देते हुए गाता है। घुरैण (स्त्री कलाकार) हाथों में कंसी बजाते हुए गाने में साथ देती है।

उन्होंने बताया कि मुसाधा लोक गायन का आयोजन नई फसल होने पर लोक गायक घर-घर जाकर अपना गायन सुना कर भी नई फसल बधाई के रूप में प्राप्त करते हैं।

लोक गायक धनी राम ने बताया कि “मुसाधा” के पदों और कथा प्रसंगों में भी रामायण, महाभारत, भगबान शिव, भगवान कृष्ण, शिव पुराण, गूग्गा गाथा, नाग लीला, राजा भरथरी आदि अनेक पौराणिक ,ऐतिहासिक कथानकों तथा आख्यानों और युगयुगीन कालक्रमिक ऐतिहासिक संदर्भों को मधुर शैली में आज भी प्रस्तुत करते हैंं।

मुसाधा गाथाओं का ऐतिहासिक महत्त्व है। परंतु धीरे-धीरे विशुद्ध परंपरा विलुप्त होती जा रही है। इसका संरक्षण और संवर्धन करना अत्यंत आवश्यक है।

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