सिरमौर – नरेश कुमार राधे
सिरमौर जिला मुख्यालय नाहन के बड़े चौक की चहल-पहल के बीच एक ऐसा कोना भी है, जहां न कोई आवाज़ लगाई जाती है और न ही किसी से मदद मांगी जाती है। इसी कोने में हर रोज़ आत्मसम्मान और मेहनत की एक खामोश कहानी लिखी जाती है।
यहां 62 वर्षीय दिनेश कुमार ज़मीन पर बैठे रंग-बिरंगे गुब्बारे बेचते हैं। पास में एक छोटी सी वजन मापने की मशीन रखी रहती है। नाहन में लोग उन्हें प्यार से “गुब्बारे वाले अंकल” कहते हैं, लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं बड़ी है। वे हालात से हार मानने के बजाय मेहनत से जीने की मिसाल हैं।
दिनेश कुमार रोज़ सुबह बड़े चौक पहुंचते हैं। बड़ा गुब्बारा 20 रुपये और छोटा 10 रुपये में बेचते हैं। वजन नापने की फीस सिर्फ 5 रुपये है। कमाई सीमित है, लेकिन पूरी तरह ईमानदार है। वे न भीख मांगते हैं और न ही किसी के आगे हाथ फैलाते हैं। उनका साफ कहना है कि मेहनत से कमाया गया पैसा ही असली सुकून देता है।
दिनेश कुमार का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की, लेकिन परिस्थितियों के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी। वर्षों तक अलग-अलग मेहनत वाले काम किए। उम्र बढ़ने के साथ भारी काम संभव नहीं रहा। तब उन्होंने छोटा, लेकिन सम्मानजनक रास्ता चुना।
नाहन के बच्चों के लिए दिनेश कुमार सिर्फ गुब्बारे बेचने वाले नहीं हैं। उनके गुब्बारे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाते हैं। यही मुस्कान उन्हें हर सुबह दोबारा बड़े चौक तक खींच लाती है।
कुछ समय पहले पांवटा साहिब के विधायक सुखराम चौधरी ने उन्हें वजन मापने की मशीन उपलब्ध करवाई। इससे उनकी रोज़ी-रोटी को सहारा मिला। लोग वजन नापते हैं और कई बार संवेदनशीलता से कुछ अतिरिक्त मदद भी कर जाते हैं।
मानवता की मिसाल नाहन के निखिल जेठी और उनके परिवार ने भी पेश की है। ‘Urban Aura’ नाम से कपड़ों की दुकान चलाने वाले इस परिवार ने दिनेश कुमार को रहने के लिए कमरा दिया है। उनसे आज तक कोई किराया नहीं लिया गया।
दिनेश कुमार के सपने बहुत बड़े नहीं हैं। उन्हें न शोहरत चाहिए, न सहानुभूति। बस इतना चाहते हैं कि काम चलता रहे और रोज़ की रोटी सम्मान के साथ मिलती रहे। बड़े चौक की यह खामोश कहानी आज भी हर रोज़ लोगों को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का अर्थ समझा रही है।

