धर्मशाला: देवता नहीं यहां लोग पहले लेते हैं राक्षस का नाम, अनोखा है इस 5080 साल पुराने मंदिर का इतिहास

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश में कई अद्भुत किस्से और कहानियां छिपी हैं, जिनका अपना एक खास महत्व है. ये राज्य टूरिस्ट के लिए आकर्षण का एक बड़ा केंद्र है, जहां की खूबसूरती हर साल सैलानियों को लुभाती है। सुहाना मौसम और मनमोहक नजारे लोगों को अपनी ओर खींचते हैं लेकिन हिमाचल केवल प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी देव संस्कृति और पौराणिक इतिहास के लिए भी प्रसिद्ध है।

इसी कड़ी में आज हम आपको धर्मशाला के भागसूनाग मंदिर के बारे में बताएंगे, जो बहुत लोकप्रिय है। इस मंदिर का नाम और इसका इतिहास दोनों ही खास हैं। कहा जाता है कि दैत्य भागसू ने नाग देवता से वरदान लिया था कि श्रद्धालु पहले उसका नाम लेंगे, इसलिए इस स्थान का नाम भागसूनाग पड़ा।

द्वापर युग के दौरान, दैत्य राजा भागसू की राजधानी अजमेर थी। उनकी प्रजा पानी की कमी से परेशान थी और उन्होंने राजा से कहा कि वह पानी का प्रबंध करें या उन्हें देश छोड़ना पड़ेगा। भागसू ने पानी की खोज करने का फैसला किया और अगले दिन वह नाग डल की ओर निकल पड़े, जो 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

भागसू ने अपनी मायावी शक्ति से नाग डल का सारा पानी अपने कमंडल में भर लिया और विश्राम करने लगे। जब नाग देवता ने देखा कि उनका डल सूखा है, तो वह गुस्से में आ गए। इसके बाद, भागसू और नाग देवता के बीच युद्ध हुआ, जिसमें नाग देवता ने भागसू को पराजित कर दिया। युद्ध के बाद, पानी डल में गिरा और वह भर गया। भागसू ने कहा कि वह चाहते हैं कि उनके नाम का उल्लेख भी इस जगह पर हो, तब नाग देवता ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनका नाम पहले आएगा।

कैसे पहुंचे भागसूनाग मंदिर

भागसूनाग मंदिर की स्थापना 5080 वर्ष पहले हुई थी। ये पवित्र स्थान दूर-दूर से भक्तों को आकर्षित करता है, जहां स्नान करने के लिए लोग आते हैं। यहां साधु संतों के लिए रोजाना लंगर भी लगाया जाता है। आप रेल मार्ग से कांगड़ा पहुंच सकते हैं और वहां से बस ले सकते हैं, जो आपको धर्मशाला तक ले जाएगी। धर्मशाला से मैक्लोडगंज के लिए बसें उपलब्ध हैं, और मैक्लोडगंज से आप आसानी से ऑटो में भागसूनाग मंदिर पहुंच सकते हैं।

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