हिमखबर डेस्क
देवभूमि हिमाचल की घाटियों में जहां आधुनिकता ने पांव पसार लिए हैं, वहीं ऊपरी शिमला और जिला सिरमौर के दुर्गम क्षेत्रों में आज भी महाभारत काल का इतिहास अपनी पूरी भव्यता के साथ जीवित है। हम बात कर रहे हैं पारंपरिक ठोडा खेल की। बैसाखी के बाद ऊपरी शिमला और सिरमौर में बिशु मेले शुरू हो जाएंगे तथा इन मेलों में ठोडा विशेष आकर्षण रहेगा।
ठोडा खेल में केवल धनुष-बाण नहीं चलते, बल्कि सदियों पुरानी शाठी और पाशी खूंदों की आपसी प्रतिद्वंद्विता और गौरवशाली परंपरा की झलक मिलती है। लोक मान्यताओं के अनुसार ठोडा खेल का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। इसमें भाग लेने वाले दो समूहों को शाठी (कौरव पक्ष) और पाशी (पांडव पक्ष) कहा जाता है। इन समूहों को स्थानीय भाषा में खूंद के नाम से जाना जाता है।
खेल शुरू होने से पहले ढोल, नगाड़े और नरसिंगों की गूंज से पूरा माहौल वीर रस से भर जाता है। योद्धा पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं और पैरों में भारी जूते व घुटनों तक सुरक्षा कवच बांधते हैं। इस खेल के नियम भी काफी सख्त हैं। तीरंदाज का लक्ष्य प्रतिद्वंदी का शरीर नहीं, बल्कि उसके पैर से लेकर घुटनों तक पिंडलियों का हिस्सा होता है।
बाण चलाने वाला योद्धा नाचते हुए और पैंतरे बदलते हुए वार करता है, जबकि सामने वाला योद्धा बिजली की फुर्ती से खुद को बचाता है। यदि बाण सीधे पैर या पिंडली पर लग जाए, तो अंक मिलते हैं, लेकिन घुटने से ऊपर वार करना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।

ठियोग, रोहड़ू, चौपाल, जुब्बल-कोटखाई में आज भी खेला जाता ठोडा खेल
बदलते समय के साथ धनुष-बाण की जगह अब सांकेतिक खेलों ने लेनी शुरू कर दी है, लेकिन जिला सिरमौर के गिरिपार और शिमला के ऊपरी क्षेत्रों ठियोग, रोहड़ू, चौपाल, जुब्बल-कोटखाई में आज भी यह अपनी मौलिकता बचाए हुए हैं। अब इस खेल के संरक्षण की तरफ कदम उठाते हुए कई खेल संस्थाएं विभिन्न स्तर की ठोडा स्पर्धाएं भी आयोजित कर रही हैं। नेरवा के बुजुर्ग ठोडा खिलाड़ी संत राम ढाढ़ू कहते हैं कि ठोडा हमारी रगों में दौड़ता इतिहास है।

