ज्वाली के आंवल ठेहडू में आस्था से भरा मंदिर ठेरे वाली माता की क्या है मान्यता, जानिए

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भलाड- शिबू ठाकुर

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि और देवनगरी के नाम से जाना जाता है क्योंकि यहां कई देवी देवताओं के मंदिर है। हिमाचल प्रदेश की खास बात यह है कि पूरे प्रदेश के हर गांव में एक मंदिर जरूर है। हिमाचल प्रदेश में ऐसा कोई कार्यक्रम या उत्सव नहीं होता है जो कि देवी देवताओं के बिना पूर्ण हो।

ऐसा ही एक आस्था से भरा मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा की तहसील ज्वाली के गांव ठेहडू में स्थित है। जिसे ठेरे वाली माता के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में पहुंचने के लिए धर्मशाला से आने वाले लोगों को जौटा होकर आना पड़ता है। जौटा से इसकी दूरी लगभग 12 किलोमीटर है और तलवाड़ा से होकर ज्वाली लव से इसकी दूरी लगभग 12 किलोमीटर है।

यह मंदिर आंवल पंचायत ठेहडू में स्थित है। इस मंदिर की ऐसी आस्था मानी जाती है और पूर्वजों द्वारा कहा जाता है कि जब 1971 मे भारत और पाकिस्तान की लड़ाई लगी थी और बंगलादेश को आजाद करवाया था। उस समय सरकार द्वारा पूरे भारत देश में व्लैक आऊट घोषित कर दिया था, लेकिन इस मंदिर के पास गद्दी समुदाय के लोगों का डेरा बैठा था और डेरे मैं आग जली हुई थी ।

जब पाकिस्तान का जहाज इस रास्ते से गुजरा और आग देखकर जो बम कांगड़ा फैंकने थे, वह बम ठेहडू में गद्दी समुदाय के लोगों पर फैकने शुरू कर दिए तो उस समय ठेरे वाली माता ने उन लोगों की रक्षा करते हुए अपना एक हाथ गंवा दिया और गंदी समुदाय के लोगों को बचा लिया। आज भी इस मंदिर की काफी आस्था मानी जाती है कि जो भी लोग माता रानी से कुछ मांगता है। उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। जिस कारण दूर दूर से लोग माता रानी के दर्शनों के लिए आंतें हैं।

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