चहरे पर राक्षसों का मुखौटा पहनकर नाचते हैं लोग, अनूठी है छतराड़ी जातर मेलों की यह परंपरा

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भरमौर – भूषण गुरुंग

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहां जाता है। यहां के मंदिरों की स्थापना को लेकर कई रोमांचक और रहस्यों से भरी कहानियां प्रचलित हैं। इनमें कुछ ऐसी भी कथाएं सामने आती हैं, जो मौजूदा दौर में हर किसी को सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं।

ऐसी की एक परंपरा का निर्वाहन शनिवार को भरमौर विस क्षेत्र के छतराड़ी जातर मेले किया गया। मान्यता है कि मां शिवशक्ति ने राक्षसों का नरसंहार किया था और इस खुशी में यह नृत्य वर्ष में एक बार होता है।

बहरहाल इस नृत्य के पीछे की बजह चाहे जो भी हो, लेकिन लोग इसे अपने इतिहास की एक अहम कड़ी मानकर सदियों से निभाते चले आ रहे हैं। जिला चंबा मुख्यालय से 56 किलोमीटर दूरी पर बसे छतराडी गांव में हर वर्ष आयोजित होने वाले जातर मेले में यह नृत्य किया जाता है।

राक्षसों के मुखौटे पहनकर एक विशेष जाति वर्ग के लोगों द्वारा यहां नृत्य किया जाता है और इस दौरान वहीं लोग मुखौटे रूपी राक्षसों और बुरी आत्माओं को जंगल की ओर भगा देते हैं।

लोगों को अपना शिकार बनाते थे राक्षस

छतराडी का जातर मेला मां शिव शक्ति को समर्पित है। कहा जाता है कि किसी समय जिस स्थान पर छतराडी गांव बसा है, वहां पर जंगल हुआ करता था और गांव के लिए इकलौता रास्ता होने के कारण यहां से आने-जाने वाले ग्रामीणों को राक्षस अपना शिकार बनाते थे।

लिहाजा मां शिव शक्ति ने यहां पर राक्षसों का नाश किया था। कहा जाता है कि राक्षसों से मुक्ति दिलाने की खुशी में राक्षसों के मुखौटे पहन नृत्य किया गया था और सैकड़ो सालों से यह परंपरा जारी है।

अलबता मौजूदा समय में भी छतराडी के शिव शक्ति मंदिर में राक्षसों के मुखौटे रखे हुए है और इन्हें स्थानीय कारीगरों ने ही सैकड़ों साल पहले बनाया था।

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