गुलेर में चित्रकला की पुनः फूटी कोंपले,18वीं शताब्दी से आरंभ हुआ था सफर

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नंदपूर- संजीव संधू

हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा के हरिपुर_गुलेर नामक स्थान पर एक ऐसी चित्रकला शैली ने जन्म लिया जो आगे चलकर पहाड़ी लघु चित्रकला (कांगड़ा कलम )के नाम से विख्यात हुई ।

18वीं और 19वीं शताब्दी में इस चित्रकला ने आसमान की बुलंदियों को छुआ। हरीपुर_गुलेर में सैकड़ों चितेरो ने भिन्न-भिन्न विषयों जैसे गीत गोविंद, रागमाला, रामायण ब राधा_ कृष्ण के प्रेम प्रसंग पर लाखों चित्र अंकित किए।

गुलेर के राजाओं,राजा दिलीप चंद व उनके पुत्र राजा गोवर्धन चंद के सरंक्षण में पंडित सेऊ व उनके तेजस्वी पुत्रों मानकू और नयनसुख द्वारा चित्रों की ऐसी श्रृंखला सृजित की जिन्हें देखकर आज भी विश्वभर के चित्रकला प्रेमी स्तब्ध है।

स्विजरलैंड के ज्यूरिक का रिटवर्ग संग्रहालय हो या फिर इंग्लैंड का अलबर्ट व विक्टोरिया म्यूजियम, भारत अथवा विश्व का शायद ही ऐसा कोई संग्रहालय होगा जहां गुलेर पोषित इन चित्रों का संग्रह ना हो।

इसी कड़ी के चलते जिला कांगड़ा विकासखंड नगरोटा सूरिया के अंतर्गत आती ग्राम पंचायत नंदपुर भटोली में मुख्यमंत्री ग्रामीण कौशल योजना के अंतर्गत गुलेर चित्रकला जो कि पिछले 100 से अधिक वर्षों से विलुप्त है को जीवित करने की दिशा में एक ठोस पहल की गई है।

कांगड़ा चित्रकला के कुशल चितेरे धनीराम ब उनके शिष्य जीवन कुमार द्वारा राजा गुलेर के नंदपुर स्थित महल में इस चित्रकला की बारीकियों को सिखाया जा रहा है।

खंडहर में तब्दील हो चुके नंदपुर महल को पुनर्जीवित कर इस चित्रकला के संरक्षण व संवर्धन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे गुलेर राजाओं के वंशज कंवर राघव गुलेरिया इस कला को हरिपुर गुलेर में पुनः स्थापित करने में लगातार प्रयासरत हैं।

हाल ही के वर्षों में नंदपुर भटोली स्थित इस महल में देश विदेश से आए कला प्रेमियों व शोधार्थियों के आने की कवायद इस बात का संकेत है कि कला और साहित्य की जननी हरीपुर_ गुलेर की इस पावन धरा पर कांगड़ा चित्रकला की नई कोंपले फूटेगी ।

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