
दो सौ प्रभावितों ने अपने दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को सौंपे
फतेहपुर – अनिल शर्मा
केंद्र व राज्य सरकार के उपेक्षित रवैये से खफा पौंग बांध विस्थापित अब अपना हक पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। प्रदेश पौंग बांध संघर्ष समिति ने बुधवार को राजा का तालाब में सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के साथ एक विशेष बैठक कर आगामी रणनीति तैयार की।
इस दौरान करीब 200 पौंग बांध विस्थापितों ने अपने दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को सौंपे। उन्होंने कहा कि पचास वर्षों से अधिक समय तक सरकार से गुहार लगाने के बावजूद राजस्थान में समझौते के अनुरूप उन्हें भूमि आवंटित नहीं हुई।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ही पौंग बांध विस्थापितों को न्याय दिलवा सकता है और समिति को पूर्ण विश्वास है कि अब उन्हें न्याय अवश्य मिलेगा। सप्ताह में अब दूसरी बैठक आयोजित होगी। समिति का कहना है कि सरकारों से बार-बार समझौते के अनुसार भूमि आवंटन का आग्रह किया गया।
यही नहीं, श्रीगंगानगर में भूमि की उपलब्धता न होने पर मुआवजे के लिए भी कहा गया, लेकिन सरकारें इस बारे क्यों नहीं कोई निर्णय ले पा रही हैं। अपनी जमीन गंवाने वालों की कोई सुध नहीं ली जा रही है।
पचास साल से झेल रहे विस्थापन का दंश
समिति के प्रधान हंस राज चौधरी और वरिष्ठ उपाध्यक्ष हुकम चंद गुलेरी ने बताया कि विस्थापन की पीड़ा का दंश झेलते हुए पचास वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। केंद्र, राजस्थान व हिमाचल की मौजूदा सरकार न ही अतीत की सरकारों ने पौंग बांध विस्थापितों की पीड़ा को समझने की कोशिश कभी नहीं की।
सरकारों ने सिर्फ अपना समय निकाला। लगातार भोले-भाले पौंग बांध विस्थापितों की भावनाओं से खेलकर उन्हें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया और विस्थापितों को आंखों की किरकरी समझकर खुद के हाल पर छोड़ दिया।
उनका कहना था कि जब हिमाचल सरकार को बिजली उत्पादन व राजस्थान को हरा-भरा करने के लिए विशाल जलाशय की जरूरत थी तो हल्दून घाटी की बेहद उपजाऊ भूमि को जलमग्न कर उन्हें भटकने के लिए छोड़ दिया।
समिति ने बताया कि अतीत में जब पौंग बांध बनाने को लेकर समझौता राजस्थान में प्रथम चरण में आरक्षित 2.20 लाख एकड़ भूमि देने का हुआ था तो फिर क्यों समझौते को दरकिनार करके द्वितीय चरण में भूमि आबंटित की जा रही है।
