कांगड़ा में अब कांटे की टक्कर, भाजपा के गढ़ में आनंद शर्मा की कड़ी चुनौती

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शाहपुर – नितिश पठानियां

भाजपा का गढ़ कहे जाने वाली कांगड़ा लोकसभा सीट पर अब चुनावी तापमान चरम पर है। कांग्रेस के टिकट में देरी से मुक़ाबला ठंडा नजर आ रहा था। पर जैसे जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा, वैसे वैसे ही कांग्रेस प्रत्याशी आनंद शर्मा ने कड़ी मेहनत से चुनावी जंग को बराबरी पर ला दिया है।

उनके लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अलावा प्रियंका गांधी ने दो जनसभाएं कर मुक़ाबले में जान फूंक दी है। अब मुक़ाबला एक्टिव मोड में नजर आ रहा है। भाजपा उम्मीदवार डॉ राजीव भारद्वाज आरंभ में फ्रंट रनर की तरह दौड़ रहे थे, मगर बाद में कांग्रेसी आनंद शर्मा ने स्प्रिंट लगाकर फिनिशिंग लाइन की और चुनावी युद्ध को बराबरी का बनाने में सफलता हासिल की है।

कांग्रेस ने यहां सुलझे व समझदार पूर्व विदेश मंत्री आनंद शर्मा को मैदान में उतार कर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी। हालांकि शर्मा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू व कांगड़ा और चंबा के विधायकों के ऊपर ज्यादा आश्रित रहे हैं। प्रदेश की अन्य तीन सीटों के मुकाबले राजनीतिक रूप से सरगर्म रहने वाले कांगड़ा लोकसभा में चुनावी माहौल एक्टिव मोड में दिखाई देने लगा है।

17 विधानसभा सीटों वाले कांगड़ा में 13 विधानसभा क्षेत्रों में से 10 में कांग्रेस के विधायक काबिज हैं, जो आनंद शर्मा की जीत के लिए दिन रात एक किए हुए हैं। वहीं, चंबा के चार विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा व कांग्रेस के दो-दो विधायक हैं।

गौरतलब है कि पिछले चुनाव में भाजपा के किशन कपूर ने पूरे देश में जीत का रिकॉर्ड बनाया था। उन्हें 2019 के चुनाव में 7 लाख 25,218 मत प्राप्त हुए थे। वहीं उनके प्रतिद्वंदी पवन काजल को मात्र 2 लाख 47,595 मत ही हासिल हो पाए थे।

इतने बड़े जीत के अंतर की कल्पना भाजपा के नेताओं ने भी नहीं की थी। मगर इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। कांग्रेस ने इस सीट को जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। सीएम ने इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा है।

वहीं, कांग्रेस ने सरकार के दो मंत्रियों के अलावा सरकार में विभिन्न पदों पर तैनात अपने विधायकों को लीड दिलाने का जिम्मा ले रखा है। धर्मशाला उप चुनाव को छोड़ दें तो शाहपुर, पालमपुर, इंदौरा, फतेहपुर, ज्वाली, चंबा, बनीखेत, बैजनाथ, ज्वालामुखी, नगरोटा बगवां, जससिंहपुर में कांग्रेसी विधायकों ने आनंद शर्मा की जीत के लिए हर संभव हथ कंडे अपना रखे हैं। इसकी कमान कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री चंद्र कुमार को दी गई है।

चंद्र कुमार के अलावा यादवेंद्र गोमा, रघुबीर बाली, भवानी पठानिया, केवल सिंह पठानिया, आशीष बुटेल, विधायक संजय रतन आदि का रिपोर्ट कार्ड भी आनंद शर्मा की जीत-हार में काउंट होगा। जिसके चलते अपने-अपने क्षेत्र से कांग्रेस के सारे विधायक अपने-अपने हिसाब से चुनाव प्रचार कर रहे हैं हालांकि, चंबा के  भटियात से विधायक व विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया संवैधानिक पद पर होने के चलते अंदरूनी तौर पर चंबा जिला से लीड दिलाने के लिए पूरी तरह कार्यरत हैं।

उधर, भाजपा उम्मीदवार डाॅ. राजीव भारद्वाज, जिन्हें शांता कुमार का राजनीतिक शिष्य माना जाता है, अपने स्तर पर स्थानीय भाजपा विधायकों के साथ चुनाव प्रचार के कई राउंड पूरे कर चुके हैं। सुलह से विधायक विपिन परमार व जसवां परागपुर से विधायक व पूर्व मंत्री विक्रम ठाकुर भाजपा उम्मीदवार के चुनाव को धार देने में लगे हैं। चुराह व डलहौजी में भी भाजपा के विधायक अपने स्तर पर प्रचार में जुटे हैं।

पूरे चुनाव का लब्बोलुआब ये है कि दोनों पार्टियों के विधायकों की परफार्मेंस पर यह चुनाव अटक गया है। दोनों उम्मीदवारों की अधिकतर चुनावी जिम्मेदारियां दोनों दलों में विधायक निभा रहे हैं। जातीय गणित की बात की जाए तो कांगड़ा विधानसभा में 25 फीसदी सामान्य, 27 फीसदी ओबीसी, 30 फीसदी एसटी जबकि 18 प्रतिशत अनुसूचित जाति के मतदाता हैं।

इस बार किशन कपूर के मैदान में न होने से गद्दी समुदाय पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। वहीं, इसी समुदाय के एक अन्य नेता त्रिलोक कपूर भी ज्यादा सक्रिय नजर नहीं आ रहे। कृषि मंत्री चंद्र कुमार ओबीसी बिरादरी को साधने में लगे हैं, वहीं भाजपा ने कांगड़ा के विधायक पवन काजल को इसका जिम्मा सौंप रखा है।

चंबा के चार और कांगड़ा के तीन विधानसभा क्षेत्रों में गद्दी समुदाय के मतदाता अहम भूमिका में रहते हैं। राजपूतों में दोनों दलों के विधायक प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं। उनका उम्मीदवार न होने से वह चुनाव में ज्यादा रूचि भी नहीं ले रहे हैं।

उधर, दोनों दलों के ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में होने के चलते यह समुदाय अपने पत्ते नहीं खोल रहा है। अनुसूचित जाति का मतदाता भी खामोश है। कुल मिलाकर यह चुनाव दो प्रत्याशियों के बीच न लड़कर विधानसभा चुनाव की तर्ज पर लड़ा जा रहा है।

चुनाव जैसे-जैसे प्रचार के अंतिम दौर की और बढ़ रहा है तो जीत हार की शर्तें लगनी शुरू हो गई हैं। केंद्रीय नेताओं की रैलियां कांगड़ा के चुनावी पारे को गर्माहट दे रहीं हैं। आनंद शर्मा अपने व्यक्तित्व के सहारे भी चुनाव को जीतने के लिए चुनावी मैदान में पसीना बहा रहे हैं।

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