आज़ाद भारत में सिरमौर के पहले शहीद की अमर गाथा: 18 की उम्र में पहनी वर्दी, 21 साल में अमर

--Advertisement--

सिरमौर – नरेश कुमार राधे 

यह कहानी केवल 47 साल पुरानी नहीं, बल्कि आज़ाद भारत में सिरमौर के पहले शहीद की है, जिनका नाम आज भी सैनिक कल्याण बोर्ड की सूची में गर्व से एक नंबर पर दर्ज है।

नाहन विकास खंड के सतीवाला (शंभू वाला) में 1941 में जन्मे वीर सपूत लीला राम, 18 वर्ष की आयु में 1959 में सेना में भर्ती हुए और महज 21 वर्ष की उम्र में 30 अक्टूबर 1962 को इंडो-चीन युद्ध में नेफा बॉर्डर पर अमरत्व प्राप्त कर लिया।

शहीद लीला राम के छोटे भाई, कर्मचंद (वन निगम में डिप्टी रेंजर के पद से सेवानिवृत्त), आज भी उस गौरव और पीड़ा को याद करते हैं।

कर्मचंद, जिनका जन्म भाई की शहादत के बाद हुआ था, माँ द्वारा सुनाए गए किस्सों में भाई की देशभक्ति को महसूस करते हैं।

वह बताते हैं, “सिर्फ 18 साल की उम्र में मेरा भाई सेना में भर्ती हो गया था। उसे खेलकूद, पढ़ाई या किसी और चीज़ से ज़्यादा लगाव वर्दी से था।”

कर्मचंद कहते हैं कि महज साढ़े तीन साल की छोटी-सी सेवा में, 21 साल की उम्र में देश के लिए सर्वस्व त्याग देने का यह साहस किसी भी युग के इतिहास में अमर रहने योग्य है।

शहीद स्वर्गीय लीला राम और स्वर्गीय लीला देवी के पुत्र थे। पिता (खेती-बाड़ी करते थे) का निधन 1985 में और माँ लीला देवी का निधन 91 साल की उम्र में हुआ।

भाई कर्मचंद बताते हैं कि माँ के बताए किस्सों में लीला राम हमेशा ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और देश के प्रति समर्पण का पाठ पढ़ाते थे। उन्होंने कहा, “माँ की आँखों में अटूट गर्व झलकता था। उनके लिए, उनका बेटा कभी मरा नहीं; वह तो अमर हो गया।”

सैनिक कल्याण बोर्ड के रिकॉर्ड तक सीमित इस गौरवशाली नाम की याद दिलाते हुए, यह कहानी युवा पीढ़ी को एक अनमोल कर्ज़ की याद दिलाती है।

यह बलिदान हमें सिखाता है कि बलिदान की कोई उम्र नहीं होती और देशभक्ति को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आज सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि हम इन वीरों के नाम और उनकी भावनाओं को आने वाली पीढ़ियों के दिलों में ज़िंदा रखें।

--Advertisement--
--Advertisement--

Share post:

Subscribe

--Advertisement--

Popular

More like this
Related